पुरातात्त्विक धरोहर को बचाने की गुहार
जिला पर्यटन एवं खेल पदाधिकारी ने किया धरोहरों का भौतिक सर्वेक्षण
देवघर: ‘झारखण्ड शोध संस्थान’ के सचिव उमेश कुमार ने जिला पर्यटन एवं खेल पदाधिकारी(डीएसओ) संतोष कुमार को देवघर की दो दुर्लभ पुरातात्त्विक धरोहर(विरासत) के संरक्षण के संबंध में एक आवेदन-पत्र दिया था। संस्थान द्वारा दिनांक 02.05.2026, पत्रांक-10/2026 के आलोक में समर्पित आवेदन-पत्र पर कार्यवाही करते हुए दिनांक 6 अप्रैल, 2026 को जिला पर्यटन एवं खेल पदाधिकारी संतोष कुमार ने दोनों धरोहरों का भौतिक सर्वेक्षण किया। इस क्रम में ‘झारखण्ड शोध संस्थान’ के सचिव उमेश कुमार, निदेशक डॉ.राजीव रंजन और दुर्लभ डाक टिकट संग्रहकर्त्ता रजत मुखर्जी डीएसओ संतोष कुमार को दोनों धरोहरों के निकट ले गए और उनकी दुर्दशा को प्रत्यक्षतः दिखलाते हुए जीर्णोद्धार की प्रार्थना की। संस्थान के सचिव उमेश कुमार ने डीएसओ को बताया कि जलसार तट का यह भग्न मंदिर दरअसल दुमका के मलूटी मंदिरों की तरह ‘चाला शैली’ की एक पुरातात्त्विक धरोहर है। यह बंगाल की ‘चाला शैली’ की धरोहर है जिसकी जुड़ाई में सीमेंट की जगह प्राकृतिक मसालों तथा युग्मकों का इस्तेमाल किया गया है। इसके दरवाज़े पर टेराकोटा की बारीक निशानियां थीं जो लंबी उपेक्षा के कारण नष्ट हो चुकी हैं। उमेश कुमार ने डीएसओ संतोष कुमार को बताया कि इस धरोहर की ऊंचाई लगभग बारह फीट और चौड़ाई लगभग छह फीट है। इसका निर्माण 1730 से 1820 के मध्य हुआ प्रतीत होता है। इसका स्थापत्य बैद्यनाथ मंदिर के पास अवस्थित नाथबाड़ी की कुछ प्रतीकों से भी मिलता है। उमेश कुमार ने बताया कि संभवतः कुछ साल पहले इस जगह कुछ ढांचागत काम किया गया था और उसी क्रम में इस धरोहर के आगे का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया।

डीएसओ ने बड़ी सूक्ष्मता से धरोहर का निरीक्षण किया और इसे मध्यकालीन वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना बताया। उन्होंने कहा कि वे इसके जीर्णोद्धार के लिए विभाग को तुरंत पत्र लिखकर निर्देश मांगेंगे।

संस्थान से जुड़े लोग डीएसओ को देवघर उपायुक्त आवास के निकट वर्षों से उपेक्षित और पेड़-पौधों के बीच नष्ट हो रहे 1857 के क़ब्रिस्तान भी दिखाने ले गए। संस्थान सचिव उमेश कुमार ने डीएसओ को बताया कि यह 1857 के सैन्य-विद्रोह से जुड़ी एक पुरातात्त्विक निशानी है जो आज भी अपने जीर्णोद्धार की राह देख रही है।
उमेश कुमार ने बताया कि यहां ‘गदर’ का नेतृत्व करने वाले भारतीय सैनिकों के हाथों दिनांक 12 जून,1857 को मारे गए एडजुटेंट नार्मन लेस्ली बार्ट और दिनांक 09 अक्तूबर,1857 को मौत के घाट उतारे गए लेफ्टिनेंट एच.सी.ए.कूपर की क़ब्र है। साथ ही, अनेक अंग्रेज़ महिलाओं और बच्चों की समाधियां भी हैं जिनका साम्राज्यवादी लिप्सा, षड्यंत्र और संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं था। उमेश कुमार ने ‘ग़दर’ की इस निशानी को दुनिया के सामने लाने की प्रार्थना की। डाक टिकट संग्रहकर्त्ता रजत मुखर्जी ने कहा कि जीर्णोद्धार के पहले यहां सभी दिवंगत विभूतियों की आत्मा की शांति के लिए ‘प्रे’ होना चाहिए। निदेशक डॉ.राजीव रंजन ने डीएसओ साहब से कहा कि देवघर की ऐसी दुर्लभ धरोहरों को बचाने के लिए ‘झारखण्ड शोध संस्थान’ लंबे समय से गुहार लगा रहा है। अब हम सबको आपसे उम्मीद है, क्योंकि आप एक संवेदनशील अधिकारी हैं। डीएसओ संतोष कुमार ने इस तरह की दुर्लभ धरोहर की मौजूदगी पर विस्मय प्रकट करते हुए शीघ्र ही जीर्णोद्धार के लिए अपने विभाग को पत्र लिखकर यथोचित कार्यवाही का भरोसा दिलाया। संस्थान की ओर से डीएसओ साहब को स्थल निरीक्षण हेतु समय देने के लिए आभार प्रकट किया गया।

