राष्ट्रीय

रवीन्द्रनाथ की काव्य प्रतिभा

छोटी उम्र से ही रवीन्द्रनाथ का जीवन रंगों से भरा हुआ था। पृथ्वी के पूर्वी कोने में गंगा के तट पर एक नवीन और सुंदर वातावरण में उनका जन्म हुआ। उनकी ज्योति भले ही छोटी थी, लेकिन उसने पूरे आकाश को आलोकित कर दिया। बचपन की भोर, युवावस्था का मध्याह्न और जीवन की संध्या — इन सबके रंगों में उनका जीवन विकसित हुआ। बाल्यकाल से ही साहित्य-चर्चा रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सहज प्रवृत्ति थी। मात्र छह वर्ष की आयु में ही कविता के प्रति उनका आकर्षण प्रकट होने लगा और उनके कंठ से पहली बार साहित्यिक ध्वनि सुनाई दी।

“जल पड़ता है, पत्ता हिलता है” — इस छोटी-सी पंक्ति को लिखकर कवि मानो एक नए संसार में प्रवेश कर गए। उनका हृदय स्वाभाविक आनंद से भर उठा। जैसे एक छोटा बच्चा शब्दों को सुनकर खेल में मग्न हो जाता है, वैसे ही रवीन्द्रनाथ ने भी अपने हृदय की मधुर अनुभूतियों को पाठकों तक पहुँचाया। 1868 में बालक रवीन्द्रनाथ ने नॉर्मल स्कूल में अध्ययन करते समय कविता लिखना आरंभ किया। विद्यालय के एक शिक्षक सत्यप्रसाद दत्त ने उन्हें कविता-लेखन के लिए प्रोत्साहित किया।
युवावस्था में प्रवेश करते ही कवि ने ‘अभिलाष’ नामक काव्य की रचना की। 1874 में ‘अमृतबाजार पत्रिका’ में उनकी कविता प्रकाशित हुई। इसके बाद उन्होंने काव्य के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करने का प्रयास किया और ‘संगीत संग्रह’ की रचना की। उनके बड़े भाई ज्योतिरिन्द्रनाथ, परिवार का सांस्कृतिक वातावरण और सौंदर्य-बोध — इन सबने उनकी काव्य-प्रतिभा को आकार दिया। इस काव्य में कवि ने अपनी आत्मशक्ति का परिचय दिया और प्रकृति के चिरंतन रूप को व्यक्त किया—
“निशीथ में धीरे-धीरे आना, अपना मधुर स्वर बजाना।”
उत्साह से प्रेरित होकर कवि ने “प्रभात संगीत” की रचना की। इस काव्य में उन्होंने जीवन की गहरी अनुभूतियों को व्यक्त किया। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा — “एक दिन सुबह बरामदे की रेलिंग पर झुककर मैं संसार को देख रहा था। उस समय ऐसा लगा मानो मनुष्य की चेतना पर पड़ा हुआ परदा हट गया हो। मैंने विश्व को एक अद्भुत महिमा, आनंद और सौंदर्य से परिपूर्ण देखा।”
कवि ठाकुर के तत्वज्ञान का विकास ‘संध्या संगीत’ में और अधिक स्पष्ट हुआ। इसी समय उन्होंने “निर्झर का स्वप्नभंग” की रचना की।
इसके बाद रवीन्द्रनाथ ने “प्रभात संगीत” की रचना की, जिसमें उन्होंने मानव-प्रेम, बाहरी संसार और अंतर्मन की गहराइयों का परिचय दिया। इस काव्य ने मानव हृदय में सौंदर्य-बोध को जागृत किया। कवि ने अनुभव किया कि मनुष्य के प्रति प्रेम ही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है—
“मैं इस सुंदर संसार में केवल खिलना नहीं चाहता,
मैं मनुष्यों के बीच जीना चाहता हूँ।”
इसके बाद कवि ने ‘मानसी’ की रचना की। ‘मानसी’ में उनकी आत्म-अभिव्यक्ति और भी गहरी हो गई। प्रकृति, सौंदर्य और मानवीय संबंधों के श्रेष्ठ अनुभवों का सुंदर समन्वय इस काव्य में देखने को मिलता है। यहीं से रवीन्द्र साहित्य के स्वर्णयुग की शुरुआत हुई।

—लेखक रजत मुखर्जी


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