कोकरोच पार्टी, टूलकिट और जेन-जी को भड़काने का षड्यंत्र- परदे के पीछे कौन?
आज का युग सूचना और संचार का युग है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने विचारों के आदान-प्रदान को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। एक समय था जब जनमत बनाने का काम अखबारों, पत्रिकाओं और टेलीविजन तक सीमित था, लेकिन अब एक साधारण मोबाइल फोन और इंटरनेट कनेक्शन के माध्यम से कोई भी व्यक्ति लाखों लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकता है। इस परिवर्तन ने लोकतांत्रिक संवाद को नई शक्ति दी है, परंतु इसके साथ ही नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं। इन्हीं चुनौतियों के बीच कुछ नए शब्द और अवधारणाएँ जन्म लेती हैं जो धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन जाती हैं। हाल के वर्षों में “कोकरोच पार्टी” ऐसा ही एक शब्द बनकर उभरा है, जिसने सोशल मीडिया की भाषा में अपनी जगह बना ली है।

यह शब्द किसी औपचारिक राजनीतिक दल का नाम नहीं है, बल्कि एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के रूप में प्रयुक्त होता है। इसका उपयोग उन समूहों, अभियानों या ऑनलाइन गतिविधियों के लिए किया जाता है जो अचानक किसी मुद्दे को लेकर अत्यधिक शोर-शराबा पैदा करते दिखाई देते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली पोस्ट, मीम, वीडियो और ट्रेंडिंग हैशटैग अक्सर इस शब्द के साथ जोड़े जाते हैं। कई लोग इसे एक संगठित डिजिटल अभियान का हिस्सा मानते हैं, जबकि कुछ इसे केवल सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का स्वाभाविक परिणाम समझते हैं। यही कारण है कि इस विषय पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता महसूस होती है।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि सोशल मीडिया का कार्य करने का तरीका पारंपरिक मीडिया से भिन्न है। यहाँ किसी भी सामग्री की सफलता उसके तथ्यात्मक मूल्य से अधिक उसके भावनात्मक प्रभाव पर निर्भर करती है। यदि कोई पोस्ट लोगों को क्रोधित, भयभीत, उत्साहित या भावुक कर देती है तो उसके वायरल होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यही कारण है कि छोटे-छोटे मुद्दे कभी-कभी विशाल सार्वजनिक बहस का रूप ले लेते हैं। एल्गोरिद्म भी ऐसी सामग्री को बढ़ावा देते हैं जो अधिक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करती है। परिणामस्वरूप कई बार वास्तविक समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं और भावनात्मक शोर प्रमुख स्थान ले लेता है।
मनोविज्ञान के विशेषज्ञ बताते हैं कि मनुष्य तथ्यों की तुलना में कथाओं से अधिक प्रभावित होता है। यदि किसी घटना को एक आकर्षक कहानी या नैरेटिव में प्रस्तुत कर दिया जाए तो लोग उसे आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। डिजिटल अभियानों में इसी सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। किसी छोटी घटना को व्यापक सामाजिक अन्याय, राजनीतिक षड्यंत्र या सांस्कृतिक संघर्ष के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद लोग बिना गहराई से जाँच किए उस नैरेटिव के पक्ष या विपक्ष में खड़े हो जाते हैं। यही प्रक्रिया कई बार भीड़-मानसिकता को जन्म देती है।
इसी संदर्भ में “टूलकिट” शब्द चर्चा में आया। सामान्यतः टूलकिट किसी अभियान को संचालित करने के लिए तैयार की गई निर्देशिका होती है। इसमें सुझाए गए हैशटैग, पोस्ट के नमूने, प्रचार सामग्री, वीडियो लिंक, संपर्क सूत्र और कार्यक्रमों की जानकारी शामिल हो सकती है। यह कोई नई अवधारणा नहीं है। सामाजिक आंदोलनों, गैर-सरकारी संगठनों, राजनीतिक दलों और नागरिक अभियानों द्वारा लंबे समय से ऐसे दस्तावेज़ तैयार किए जाते रहे हैं। डिजिटल युग में इनकी पहुँच और प्रभाव दोनों बढ़ गए हैं।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी टूलकिट का उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाने तक सीमित न रहकर लोगों की भावनाओं को भड़काना या समाज में ध्रुवीकरण बढ़ाना प्रतीत होता है। ऐसे मामलों में आरोप लगाए जाते हैं कि किसी विशेष समूह या शक्ति द्वारा संगठित रूप से जनमत को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हर टूलकिट को साजिश का दस्तावेज़ मान लेना उचित नहीं होगा। कई बार ये केवल अभियान प्रबंधन के सामान्य उपकरण होते हैं। इसलिए किसी भी दस्तावेज़ या अभियान का मूल्यांकन उसके उद्देश्य, सामग्री और प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।
जेन-जी अर्थात वर्तमान युवा पीढ़ी इस पूरे विमर्श के केंद्र में दिखाई देती है। यह पीढ़ी डिजिटल दुनिया में जन्मी और पली-बढ़ी है। इसकी सूचना प्राप्त करने की आदतें पिछली पीढ़ियों से अलग हैं। समाचार पत्र पढ़ने या लंबी बहस सुनने की बजाय यह छोटे वीडियो, मीम, रील और सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से जानकारी प्राप्त करती है। इस कारण यह नई सूचनाओं को तेजी से ग्रहण करती है, लेकिन कई बार उनकी सत्यता की जाँच करने का पर्याप्त समय नहीं लेती।
यही वजह है कि जेन-जी को किसी भी अभियान का सबसे प्रभावी लक्ष्य माना जाता है। यदि कोई संदेश युवाओं की भावनाओं, पहचान, भविष्य की चिंताओं या सामाजिक न्याय की भावना को संबोधित करता है तो वह बहुत तेजी से फैल सकता है। संवेदनशील चित्र, भावनात्मक वीडियो, प्रभावशाली संगीत और प्रेरक नारे युवाओं को आकर्षित करने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं। कई बार यह सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनते हैं, लेकिन कभी-कभी यही तकनीकें गलत सूचना और अतिवादी विचारों को भी लोकप्रिय बना देती हैं।
यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में कोई संगठित षड्यंत्र युवा पीढ़ी को भड़काने के लिए कार्य कर रहा है? इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। इतिहास बताता है कि विभिन्न देशों में विदेशी शक्तियों, वैचारिक संगठनों और राजनीतिक समूहों ने जनमत को प्रभावित करने के प्रयास किए हैं। डिजिटल युग ने इन प्रयासों को आसान बना दिया है। नकली खातों, बॉट नेटवर्क, प्रायोजित सामग्री और समन्वित अभियानों के माध्यम से किसी भी विषय को कृत्रिम रूप से लोकप्रिय बनाया जा सकता है। यह एक वास्तविक चुनौती है जिसे पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
लेकिन दूसरी ओर हर सामाजिक असंतोष को विदेशी षड्यंत्र का परिणाम मान लेना भी गलत होगा। बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, शिक्षा संबंधी समस्याएँ, प्रशासनिक विफलताएँ और सामाजिक अन्याय जैसे मुद्दे लोगों में स्वाभाविक असंतोष पैदा करते हैं। यदि इन समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता तो कोई भी अभियान या नैरेटिव आसानी से लोकप्रिय हो सकता है। इसलिए किसी आंदोलन या डिजिटल अभियान को समझने के लिए उसके सामाजिक और आर्थिक संदर्भ को भी देखना आवश्यक है।
विदेशी हस्तक्षेप और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच भी अंतर करना जरूरी है। वैश्विक दुनिया में विभिन्न देशों के संगठन, शोध संस्थान और नागरिक समूह एक-दूसरे से संवाद करते हैं। यह सहयोग लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सामान्य हिस्सा हो सकता है। लेकिन यदि किसी अभियान की फंडिंग, रणनीति या संचालन में पारदर्शिता का अभाव हो तो संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता पारदर्शिता की है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि किसी अभियान के पीछे कौन लोग हैं, उसका वित्तीय स्रोत क्या है और उसके घोषित उद्देश्य क्या हैं।
राजनीतिक विमर्श में अक्सर विभिन्न समूहों को लेबल देने की प्रवृत्ति भी देखी जाती है। “लेफ्ट”, “लिबरल”, “राइट विंग”, “अर्बन नक्सल”, “राष्ट्रवादी” या अन्य कई शब्द बहस का हिस्सा बन जाते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब इन लेबलों का उपयोग किसी व्यक्ति या समूह की बात को सुने बिना उसे खारिज करने के लिए किया जाने लगे। लोकतंत्र में विचारों की विविधता स्वाभाविक है। किसी भी असहमति को षड्यंत्र या देश-विरोध से जोड़ देना उतना ही खतरनाक है जितना वास्तविक खतरों को नज़रअंदाज़ करना।
ऐसी परिस्थितियों में नागरिकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। सबसे प्रभावी रक्षा मीडिया साक्षरता है। लोगों को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर जानकारी सत्य नहीं होती। किसी भी वायरल पोस्ट को साझा करने से पहले उसके स्रोत की जाँच करनी चाहिए। यदि कोई वीडियो, तस्वीर या दस्तावेज़ अत्यधिक भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न कर रहा हो तो उसकी सत्यता की पुष्टि करना और भी आवश्यक हो जाता है।
युवाओं को विशेष रूप से डिजिटल अनुसंधान के कौशल सिखाए जाने चाहिए। उन्हें यह समझाया जाना चाहिए कि सूचना के स्रोतों की तुलना कैसे की जाए, तथ्य-जाँच वेबसाइटों का उपयोग कैसे किया जाए और एल्गोरिद्म किस प्रकार उनके सामने चयनित सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यदि जेन-जी इन कौशलों में दक्ष हो जाती है तो उसे किसी भी भ्रामक अभियान द्वारा आसानी से प्रभावित नहीं किया जा सकेगा।
संवाद भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में विरोध, आलोचना और असहमति स्वाभाविक हैं। लेकिन जब संवाद की जगह आरोप, अफवाह और नफरत ले लेते हैं तो समाज में विभाजन बढ़ने लगता है। इसलिए विभिन्न विचारधाराओं के लोगों के बीच संवाद को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। मतभेद होना समस्या नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब संवाद समाप्त हो जाता है।
अंततः “कोकरोच पार्टी”, टूलकिट और जेन-जी को भड़काने के कथित षड्यंत्र जैसे विषयों पर चर्चा करते समय संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। सोशल मीडिया और डिजिटल अभियान निश्चित रूप से जनमत को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। कुछ मामलों में संगठित और उद्देश्यपूर्ण प्रयास भी हो सकते हैं। लेकिन हर वायरल घटना या विदेशी संपर्क को षड्यंत्र मान लेना तथ्यात्मक दृष्टि से उचित नहीं होगा। वास्तविकता अक्सर अधिक जटिल होती है, जिसमें स्थानीय समस्याएँ, सामाजिक असंतोष, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, डिजिटल तकनीक और मानवीय मनोविज्ञान सभी अपनी भूमिका निभाते हैं।
देश और समाज की स्थिरता को बनाए रखने का सबसे प्रभावी तरीका भय या अंधविश्वास नहीं, बल्कि पारदर्शिता, विवेक, संवाद और जिम्मेदार नागरिकता है। यदि नागरिक तथ्य और अफवाह के बीच अंतर करना सीख जाएँ, यदि युवा मीडिया साक्षरता को अपनाएँ और यदि संस्थाएँ पारदर्शी एवं जवाबदेह बनें, तो किसी भी वास्तविक या काल्पनिक टूलकिट की शक्ति सीमित हो जाएगी। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जागरूक नागरिक होते हैं, और वही किसी भी प्रकार की भ्रामक सूचना या अस्थिरता के विरुद्ध सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच भी हैं।
-लेखिका डॉ. प्रियंका सौरभ

