अधिनायकवाद का उदय और पतन: नाजीवाद व फासीवाद से इतिहास की सीख
नाजीवाद और फासीवाद जब राजसत्ता प्राप्त करते हैं तो उनका पहला प्रयास धार्मिक, शैक्षणिक, मीडिया, सांस्कृतिक और संवैधानिक संस्थाओं को अपने प्रभाव में लेने का होता है। इन संस्थाओं के माध्यम से वे धीरे-धीरे अपने एजेंडे और अपनी विचारधारा को समाज पर थोपना शुरू करते हैं।

धार्मिक संस्थाओं पर प्रभाव स्थापित करके वे सबसे पहले स्वयं को धर्म का सबसे बड़ा रक्षक, ध्वजवाहक और ईश्वर का सच्चा प्रतिनिधि सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। दूसरे धर्मों या समुदायों को अपने धर्म के लिए खतरा बताकर भय और असुरक्षा का वातावरण निर्मित किया जाता है। जब उन्हें लगता है कि समाज का एक बड़ा वर्ग उनके अनुसार चलने लगा है, तब व्यक्तिपूजा (Personality Cult) को इस स्तर तक पहुँचा दिया जाता है कि नेता को राष्ट्र, धर्म और संस्कृति का पर्याय मान लिया जाता है।
शैक्षणिक संस्थाओं पर प्रभाव स्थापित करके वे शिक्षा व्यवस्था को अपने अनुसार ढालने लगते हैं। उनकी वास्तविक मंशा स्वतंत्र और आलोचनात्मक चिंतन को सीमित कर ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करना होती है, जिसमें लोग प्रश्न पूछने के बजाय उनके द्वारा स्थापित विचारों को ही सत्य मान लें। इतिहास की अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या की जाती है, कुछ घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है और कुछ को दबा दिया जाता है।
सांस्कृतिक संस्थाओं पर प्रभाव स्थापित होने के बाद साहित्य, कला, रंगमंच, सिनेमा और अन्य सांस्कृतिक माध्यमों का उपयोग अपने कृत्यों के महिमामंडन के लिए किया जाता है। अपने नायकों को महान और विरोधियों को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। धीरे-धीरे एक ऐसा सांस्कृतिक वातावरण बनाया जाता है जिसमें सत्ता की आलोचना देश, धर्म या संस्कृति की आलोचना प्रतीत होने लगे।
मीडिया पर प्रभाव स्थापित करके वह प्रचार, दुष्प्रचार और आधे-अधूरे तथ्यों के माध्यम से अपने पक्ष का वातावरण तैयार करता है। अपने नेतृत्व का महिमामंडन करता है, विरोधियों का मानमर्दन करता है और उन्हें बदनाम करने का प्रयास करता है। जनता तक वही सूचनाएँ अधिक पहुँचती हैं जो उसके हित में हों।
संवैधानिक संस्थाओं पर प्रभाव बढ़ने के बाद वह सत्ता का केंद्रीकरण करने लगता है। अपने अनुसार नीतियाँ और नियम बनवाने का प्रयास करता है। न्यायपालिका, जाँच एजेंसियों तथा अन्य स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। जो विरोध करते हैं उन्हें किनारे लगाने या उनकी आवाज़ को सीमित करने का प्रयास किया जाता है। परिणामस्वरूप सत्ता का संतुलन एक व्यक्ति या एक समूह के हाथों में सिमटने लगता है।
इसके बाद वह अधिनायक की तरह शासन करने लगता है। धीरे-धीरे स्वयं को ही राष्ट्र, धर्म, संस्कृति और संविधान का प्रतीक बताने का वातावरण निर्मित किया जाता है। भय का माहौल खड़ा किया जाता है।
विरोधियों को जेलों में डाला जाता है, मीडिया और प्रचार तंत्र के माध्यम से उनकी छवि धूमिल की जाती है और उन्हें राष्ट्रविरोधी सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है।
इस तिलिस्म में उसे लगता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है। परंतु उसे यह दिखाई नहीं देता कि भीतर ही भीतर असंतोष भी पनप रहा है। सत्ता के मद में वह इतना मदान्ध हो जाता है कि उसे लगता है जनता उसका अंधानुकरण कर रही है। एक वर्ग ऐसा करता भी है, किंतु दूसरा वर्ग भीतर ही भीतर घृणा, तिरस्कार और आक्रोश से भरने लगता है। समय आने पर यही असंतोष सार्वजनिक विरोध के रूप में प्रकट होता है। इस स्थिति को वह सहन नहीं कर पाता और उसका अंतिम हथियार दमन चक्र बन जाता है। किंतु वह यह समझ नहीं पाता कि दमन असंतोष को समाप्त नहीं करता, बल्कि अनेक बार उसे और अधिक व्यापक तथा संगठित बना देता है।
इतिहास में अनेक अधिनायकवादी शासन इसी प्रकार गहरे जन-असंतोष, युद्ध, आर्थिक संकट अथवा सत्ता संघर्ष के कारण अंततः कमजोर पड़े या समाप्त हुए। नाजी जर्मनी इसका एक प्रमुख उदाहरण है। द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम चरण में जब जर्मनी की पराजय लगभग निश्चित हो गई और बर्लिन पर मित्र राष्ट्रों का कब्ज़ा आसन्न था, तब हिटलर ने पकड़े जाने के बजाय अपनी साथी ईवा ब्राउन के साथ आत्महत्या कर ली।गोऐबल ने भी आत्महत्या की।
इतिहास यह अवश्य बताता है कि कोई भी अधिनायकवादी शासन स्थायी नहीं होता। वह कुछ वर्षों या कई दशकों तक चल सकता है, परंतु जब वह समाज, संस्थाओं और जनता से अपना नैतिक आधार खो देता है, तब अंततः उसका पतन निश्चित हो जाता है।


