उत्सव

अंतरराष्ट्रीय मातृ दिवस विशेष: जिनके कोख से भगवान भी पैदा होते हैं

माँ से मातृत्व, माँ से ममता, माँ से मिट्टी , माँ से करुणा, माँ से साहस, माँ से मैं और माँ से सबकुछ। चाहे जीव किसी भी योनि में पैदा हुआ हो उसकी माँ ही उसकी पहली गुरु होती है। माँ शब्द सदा से ही पूज्य रहा है, शायद इसी वजह से देवियों के नाम के बाद ‘माँ’ या ‘माता’ शब्द जोड़ा जाता है । माँ का प्रेम अपने संतान के प्रति हमेशा निःस्वार्थ और स्वयं को न्योछावर करने वाला होता है। भारत की पारिवारिक परम्परा में ही माँ का स्थान सर्वोच्च है। सभी माताएँ अपने में इतनी महान है कि हमारे यहाँ ‘महान माता’ जैसा कोई शब्द शायद मौजूद नहीं अपितु माँ को मातृ देवी या भगवती, दुर्गा, लक्ष्मी या सरस्वती का रूप ही माना गया है। माँ शब्द आते ही अपनी माता के करुणामयी चेहरे साथ और भी कई अद्वितीय माताओं के नाम मन-मस्तिष्क में उजागर होते हैं।

माँ कौशल्या
    जिनके कोख में भगवान ने भी अपने को सुरक्षित पाया होगा, आँख खुलते ही जिस माँ से आँख मिलाया होगा, और जिन नयनों ने श्री राम के कमल चरण को पहली बार मिट्टी से लगते, ठुमक-ठुमक संभलते,चलते और दौड़ते देखा होगा, ऐसी महान माता कौशल्या जिनके चरणों में जो श्रीचरणों वाले प्रभु राम को भी स्वर्ग समाया दिखता होगा – उन मातृ देवी को नमन। वो श्री राम की प्रथम गुरु भी थी जैसे सभी माताएं होती हैं। जब सभी के एक ही समय पर निश्छल बालक राम के सामने बांह फैलाकर पुकारते होंगे …तनिक भी संकोच ना कर कौशल्या माँ के पास कदम बढ़ाके गले से लगाया होगा वो माँ की महानता के लिए उद्धृत हर शब्द शायद ही संज्ञा का रूप हो अपितु विशेषण जैसा ही सुना, समझा गया होगा।
माता कौशल्या का जीवन त्याग, धैर्य और धर्मनिष्ठा की अद्वितीय मिसाल है। छत्तीसगढ़ के चंदखुरी में जन्मी कौशल्या का विवाह अयोध्या के राजा दशरथ से हुआ और वे भगवान राम की माता बनीं। जब राम को 14 वर्ष का वनवास मिला, तब उन्होंने एक आदर्श माता होने के बावजूद उन्हें रोकने के बजाय धर्म और पति के वचन की मर्यादा को सर्वोपरि रखा। यह उनके निस्वार्थ प्रेम और कर्तव्यपरायणता को दर्शाता है। राम के वियोग में उन्होंने अत्यंत दुख सहा और अयोध्या में तपस्विनी की तरह जीवन बिताया। फिर भी उन्होंने भरत के प्रति स्नेह बनाए रखा और उन्हें निर्दोष माना। उनका जीवन सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, त्याग और कर्तव्य का पालन ही सच्चा धर्म है।

माँ देवकी
   माता देवकी का जीवन त्याग, साहस और मातृत्व की गहरी वेदना का प्रतीक है। उनका विवाह वसुदेव से हुआ, लेकिन उनके भाई कंस को यह भविष्यवाणी मिली कि उनकी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र ही उसका वध करेगा। भयभीत कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। देवकी ने एक-एक कर अपने छह पुत्रों को कंस के हाथों खो दिया। अपने नवजात पुत्रों को दुलार से देख पाती उसके पहले ही उनके नवजात शिशुओं को काल के गाल में कंस ने समाहित कर दिया। ऐसे क्रूरता के दंश माता के करुण आँख और हृदय को पत्थर बना दिया होगा…फिर भी उन्होंने धैर्य नहीं छोड़ा।जब भगवान कृष्ण का जन्म हुआ, तब देवकी ने अपने नवजात शिशु को स्वयं से दूर भेजने का कठिन निर्णय लिया, ताकि उसका जीवन बच सके। यह एक माँ के लिए सबसे बड़ा त्याग था। उन्होंने अपने पुत्र के सुख और संसार की भलाई के लिए अपने मातृत्व का बलिदान दिया।देवकी की कथा सिखाती है कि सच्चा प्रेम त्याग और धैर्य में निहित होता है, और कठिनतम परिस्थितियों में भी आशा और विश्वास बनाए रखना चाहिए।

माता यशोदा
   माता यशोदा और श्रीकृष्ण का संबंध भारतीय संस्कृति में मातृत्व के सबसे स्नेहमय और सहज रूप का प्रतीक माना जाता है। यशोदा जी ने कृष्ण को जन्म नहीं दिया, फिर भी उनका प्रेम किसी भी जननी से कम नहीं था। गोकुल में उन्होंने कृष्ण का पालन-पोषण अत्यंत स्नेह, ममता और लाड़-प्यार से किया।
    गोकुल की गलियों में नटखट बालक कृष्ण अपनी बाल लीलाओं से सबका मन मोह लेते थे, लेकिन माता यशोदा के लिए वे सिर्फ एक शरारती बच्चा नहीं, बल्कि उनके हृदय का टुकड़ा थे। एक दिन कृष्ण ने माखन चुराकर खाया और मटकी तोड़ दी। जब यशोदा ने उन्हें डांटा, तो वे मासूम बनकर बोले, “मैंने कुछ नहीं किया।” उनकी आँखों में छलकती निश्छलता देखकर भी यशोदा का मातृ-हृदय पिघल जाता था। फिर भी, उन्हें अनुशासन सिखाने के लिए यशोदा ने उन्हें ऊखल से बाँध दिया।
परंतु यही वही क्षण था जब संसार ने देखा कि यह छोटा बालक कोई साधारण नहीं है। यशोदा के लिए कृष्ण ईश्वर नहीं, उनका लाड़ला बेटा था—जिसे वे प्यार करती थीं, डांटती थीं और अपने आंचल में सुलाती थीं। यह संबंध सिखाता है कि मातृत्व में प्रेम, ममता और अनुशासन का अद्भुत संतुलन होता है।

माता कुंती
   महाभारत में कुंती का चरित्र संघर्ष और साहस से भरा है। युवावस्था में ही उन्होंने अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना किया। विवाह से पहले ही पुत्र कर्ण को त्यागना उनके जीवन का सबसे बड़ा बलिदान था। बाद में पांडवों की माता बनकर उन्होंने वनवास, अपमान और युद्ध जैसी परिस्थितियों में अपने पुत्रों का साहस बढ़ाया। हर कठिनाई में उन्होंने धर्म का साथ नहीं छोड़ा। कुंती का जीवन सिखाता है कि सच्ची शक्ति त्याग, सहनशीलता और विश्वास में होती है।

माता मरियम
   माता मरियम की महानता उनके दिव्य चुनाव, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, और विनम्रता में निहित है। वे यीशु मसीह की माँ (‘ईश्वर की माता’), जो ‘निष्कलंक गर्भाधान’ और ‘स्वर्गारोहण’ के सिद्धांतों के माध्यम से कलीसिया में सर्वोच्च स्थान रखती हैं। वे धैर्य, विश्वास, और प्रेम की प्रतीक हैं, जो मध्यस्थता द्वारा मानवता की रक्षा करती हैं।

-लेखक रजत मुखर्जी

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