कविता: हमारी पृथ्वी
आन पड़ी है आज जरूरत, अपनी भूमि बचाने की।
खतरे में है पूरी पृथ्वी डर है विध्वंस हो जाने की।।
लोगों की बढ़ती जनसंख्या, यह तो रोग पुरानी है।
सुन मेरे भाई, ये पेड़-कटाई, प्रदूषण की नानी है।।

संतुलन बिगड़ा प्रकृति का छेड़छाड़ के कारण से
ठंडी-गर्मी बहुत बढ़ी है, प्रदूषण के धारण से।।
सुखी धरती, जीवन सूखा, फसल मरी तो मानव भूखा
रो रही है अपनी चरती, प्यासी आँखे, चेहरा रुखा।।
मानव ने मानवता खोया, धन ने विष का बीज है बोया।
फसल जहर का है उग आया, इसके फल-फूल मोह और माया।।
देशों के बीच मेल नहीं है, पृथ्वी आतंक झेल रही है
बम और बारुद खिलौने हैं, दुनियाँ इससे खेल रही है।।
परमाणु विध्वंस कर रही, पहाड़ बन रही खाई है
देखो! ऐसे ना रौंदो इनको, ये तो अपनी माई है।।
आज धरती माँ कराह रही है, वो हम सबको बुला रही है।
यूँ मत छेड़ो देखो मुझको, तेरी हरकत रुला रही है।।
-कवि अमित दुबे

