28 जून: पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी नरसिंह राव जयंती
पामुलापति वेंकट नरसिंह राव भारत के नौवें प्रधानमंत्री के रूप में जाने जाते हैं। आज ही के दिन 28 जून, 1921 को उनका जन्म आंध्र प्रदेश के वांगरा ग्राम करीम नागर में हुआ था। नरसिंह राव विभिन्न अभिरुचियों वाले इंसान थे। वह संगीत, सिनेमा और थियेटर अत्यन्त पसन्द करते थे। उनको भारतीय संस्कृति और दर्शन में काफ़ी रुचि थी। इन्हें काल्पनिक लेखन भी पसन्द था। वह प्राय: राजनीतिक समीक्षाएँ भी करते थे। वे राव एक अच्छे भाषा विद्वानी भी थे। उन्होंने तेलुगु और हिन्दी में कविताएँ भी लिखी थीं। समग्र रूप से इन्हें साहित्य में भी काफ़ी रुचि थी। उन्होंने तेलुगु उपन्यास का हिन्दी में तथा मराठी भाषा की कृतियों का अनुवाद तेलुगु में किया था। उनमें कई प्रकार की प्रतिभाएँ थीं। उन्होंने छद्म नाम से कई कृतियाँ लिखीं। अमेरिकन विश्वविद्यालय में व्याख्यान दिया और पश्चिमी जर्मनी में राजनीति एवं राजनीतिक सम्बन्धों को सराहनीय ढंग से उदघाटित किया। उन्होंने द्विमासिक पत्रिका का सम्पादन भी किया। मानव अधिकारों से सम्बन्धित इस पत्रिका का नाम ‘काकतिया’ था।
ऐसा माना जाता है कि इन्हें राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की 17 भाषाओं का ज्ञान था तथा भाषाएँ सीखने का जुनून था। वह स्पेनिश और फ़्राँसीसी भाषाएँ भी बोल व लिख सकते थे। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में भी भाग लिया था। आज़ादी के बाद वह पूर्ण रूप से राजनीति में आ गए लेकिन उनकी राजनीति की धुरी उस समय आंध्र प्रदेश तक ही सीमित थी। नरसिम्हा राव को राज्य स्तर पर काफ़ी ख्याति भी मिली। 1962 से 1971 तक वह आंध्र प्रदेश के मंत्रिमण्डल में भी रहे। 1971 में राव प्रदेश की राजनीति में कद्दावर नेता बन गए। वह 1971 से 1973 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे।

परिवर्तन ही शाश्वत होता है, अत: समय के अनुसार परिवर्तन होना चाहिए। सम्पूर्ण विश्व एक स्वीकार्य मंडी बन गया था। इस कारण यह सम्भव ही नहीं था कि भारत अनुदार आर्थिक नीति के साथ चिपका रहे। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव ने आर्थिक सुधारों का श्रीगणेश किया। भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के अनुकूल बनाने के सारगर्भित प्रयास किए। इस समय वैश्वीकरण और सरल निजीकरण की धूम मची हुई थी। सार्वजनिक क्षेत्रों के उन उपक्रमों को रेखांकित किया गया जो तमाम आर्थिक उपचार के बाद भी घाटा ही उगल रहे थे। इस समय नरसिम्हा राव के वित्तमंत्री मनमोहन सिंह थे, जो कि एक बेमिसाल अर्थशास्त्री भी हैं। नरसिम्हा राव ने अपने वित्त मंत्री के आर्थिक सुधार कार्यक्रमों पर पूर्णतया विश्वास व्यक्त किया। इस कारण घाटे में चलने वाले कई सरकारी उद्योगों के निजी हाथों में सौंपने का फ़ैसला किया गया। इसके अतिरिक्त खुली आर्थिक व्यवस्था में लाइसेंसीकरण को समाप्त किया गया।


