पर्यावरण (शहर परिक्रमा)

पर्यावरण प्रदूषण संरक्षण और कॉर्पोरेट का खेल

किसी भी वाहन को चलाने के लिए एक ऊर्जा की आवश्यकता होती है ई-वाहन में यह ऊर्जा बिजली है जिसे स्टोर किया जाता है जो बैटरी के माध्यम से किया जाता है। ई-वाहनों में उपयोग होने वाला बैटरी मुख्य रूप से लिथियम और कोबॉल्ट से बनता है। लिथियम के खनन के लिए ढेरों जंगल काटे गए हैं और कट ही रहे हैं। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि लिथियम खनन और संवर्धन में भारी मात्रा में मीठा पानी लगता है। एक टन लिथियम निकालने में करीब 19 से 22 लाख लीटर पानी लगता है। क्या यह पर्यावरण का दोहन  नहीं है?

वर्तमान समय में दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रभाव धीरे धीरे बढ़ता जा रहा है। इलेक्ट्रिक वाहन पर नए नए शोध हो रहे हैं। किसी भी शोध कार्य में भारी मात्रा में धन लगता है। दुनिया में ज्यादातर शोध कार्य बाजार आधारित होते हैं और इसके लिए धन कॉर्पोरेट सेक्टर ही ज्यादातर लगाता है। प्रबंधन शास्त्र का मूल सिद्धांत है कि कैसे अपना लाभ बढ़ाया जाए। तो जाहिर है अगर कोई कॉर्पोरेट किसी शोध में धन लगाएगा तो वह उस धन की वसूली भी करेगा ही वो भी लाभ और ब्याज सहित।

इलेक्ट्रिक वाहन को प्रसारित करने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जा रहा है कि ये वाहन पारंपरिक वाहन यानी पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों के मुकाबले शून्य प्रदूषण करते हैँ। पारंपरिक वाहन धुआँ छोड़ते हैं जिससे पर्यावरण प्रदूषित होता है। दूसरा कारण दिया जा रहा है कि दुनिया में कच्चे तेल का भंडार खत्म हो रहा है जो कि सिर्फ एक अनुमान है। अब सवाल यह उठता है कि क्या ई-वाहन सही में प्रदूषण कम करते हैँ ? क्या इनके निर्माण से पर्यावरण एकदम प्रदूषित नहीं होता है?
   किसी भी वाहन को चलाने के लिए एक ऊर्जा की आवश्यकता होती है ई-वाहन में यह ऊर्जा बिजली है जिसे स्टोर किया जाता है जो बैटरी के माध्यम से किया जाता है। ई-वाहनों में उपयोग होने वाला बैटरी मुख्य रूप से लिथियम और कोबॉल्ट से बनता है। लिथियम के खनन के लिए ढेरों जंगल काटे गए हैं और कट ही रहे हैं। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि लिथियम खनन और संवर्धन में भारी मात्रा में मीठा पानी लगता है। एक टन लिथियम निकालने में करीब 19 से 22 लाख लीटर पानी लगता है। क्या यह पर्यावरण का दोहन  नहीं है? दुनिया में वैसे ही मीठे पानी की किल्लत है। लिथियम के खनन करने वाले कुछ देशों में जैसे चिली और अर्जेंटीना में पानी की किल्लत होनी शुरू हो गई है।

  लिथियम बैटरी बनाने में कोबॉल्ट का भी उपयोग होता है। इसके खनन के लिए भी बहुत सारे जंगल काटे जा रहे हैं। जंगल कटने से सिर्फ पेड़ ही नहीं कटते, बल्कि बहुत से जीव-जन्तु और पादप भी नष्ट होते हैं। पशु-पक्षियों का घर उजड़ जाता है। वे खाने के लिए तरसने लगते हैं और अंततः या तो मर जाते हैं या फिर मानव बस्तियों में घुसने लगते हैं जिससे अंततः मनुष्यों को ही तकलीफ होती है। उसमें कुछ हिंसक जानवर भी होते हैं जो मनुष्यों पर भी आक्रमण कर देते हैं। कोबॉल्ट का सबसे ज्यादा भंडार कांगो देश में है। रिपोर्ट में तो यह भी कहा जाता है कि कोबॉल्ट उत्खनन में बच्चों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। इस तरह हम यह कह सकते हैं कि एक ई-वाहन बनाने में जितना प्रदूषण होता है उतना तो एक कार पूरे साल में भी प्रदूषण नहीं फैलाती।
   अंत में जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर होता है कि इलेक्ट्रिक वाहन बिजली से चलने वाला वाहन  है।  उसमें चार्जेबल बैटरी लगती है। चार्जिंग के लिए बिजली की भी आवश्यकता होगी। तो बिजली उत्पादन में भी देखा जाए तो सबसे ज्यादा ताप विद्युत घर का ही उपयोग किया जाता है। ताप विद्युत घर में मुख्यतः कोयले और पानी से बिजली बनाई जाती है। कोयले के उत्खनन में हुआ प्रदूषण और बिजली बनाने के क्रम में ताप विद्युत घर से उत्सर्जित प्रदूषण को भी इसमें जोड़ा जाए। देखा जाए तो जितना प्रदूषण एक ई-वाहन बनाने में होता है उतना तो पारंपरिक वाहन एक साल में भी प्रदूषण नहीं कर पाएगा।
ताप विद्युत् घर में मुख्यतः कोयले और पानी से बिजली बनाई जाती है। इसमें बिजली बनाने के लिए कोयले का मुख्य रूप से उपयोग होता है। इस तरह के बिजली घर में पानी को सबसे पहले परिशोधित किया जाता है जिसे डीएम जल ( demineralised water) कहा जाता है। इसमें पानी में मिले सारे खनिज पदार्थों को निकाला जाता है। इस क्रम में पानी की भी बर्बादी होती है। इसके लिए एक संयंत्र लगता है जिसमें भारी मात्रा में तरह तरह के रसायन लगते है। उन रसायनों में अम्ल की मात्रा ज्यादा होती है। बताते चलें कि इस तरह के संयंत्र जहाँ लगते हैं वहाँ  का भूगर्भ जल भी प्रदूषित हो जाता है| इतना ही नहीं, ताप विद्युत् घर से निकली हुई राख इतनी नुकसानदेह होती है कि आस पास की ज़मीन को बंजर बना देती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो जितना प्रदूषण एक ई-वाहन बनाने में होता है उतना तो पारंपरिक वाहन एक साल में भी प्रदूषण नहीं कर पाएगा।
    यह सारा खेल कॉर्पोरेट और सरकार के हाथों में है और दोनों मिलकर इसके सूत्र का संचालन करते हैं। कॉर्पोरेट कुछ नए के नाम पर लोगों को बरगलाता है तो सरकार नए नियम बनाकर उसे लागू करती है और कॉर्पोरेट को बाजार में घुसने में और टिके रहने में मदद करती है। ऐसे ही दुनिया की अर्थव्यवस्था चल रही है। निरीह जनता की जेब कट रही है और कॉर्पोरेट दिन दो गुनी रात चौगुनी के हिसाब से बढ़ता जा रहा है|

लेखक सचिन्द्र नाथ झा

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