उत्सव

अंग प्रदेश की “सुकरतिया”: दीपावली की लोकधारा में झिलमिलाती सांस्कृतिक ज्योति


अंग प्रदेश की मिट्टी जितनी उपजाऊ है, उतनी ही समृद्ध इसकी संस्कृति और भाषा भी है। यहाँ दीपों का पर्व दीपावली केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन का उत्सव है — और इसी उत्सव को अंग प्रदेश के लोग अपने आत्मीय नाम “सुखरात”, “सुखरतिया” या “सुकरतिया” से पुकारते हैं। यह नाम केवल शब्द नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की भाषाई विरासत और सांस्कृतिक आत्मा का सजीव प्रतीक है।
अंग क्षेत्र — जो आज के बिहार, झारखंड और बंगाल के हिस्सों में फैला है, में अंगिका भाषा की मधुरता हर साँस में बसती है। इस भाषा की अपनी लय, अपनी मिठास और अपनी शब्द-संवेदना है। इसी से उपजा है “सुकरतिया” शब्द, जिसने दीपावली को एक लोकभावन नाम दिया है।
फेसबुक पर जब कुछ लोगों ने यह प्रश्न उठाया कि “अख़िर दीपावली को सुकरतिया क्यों कहा जाता है?”, तब मन में यह जिज्ञासा और गहराई तक उतर गई। मैंने भी इस शब्द की जड़ तक पहुँचने की कोशिश की। और पाया कि यह कोई साधारण नाम नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही लोकबुद्धि का सार है।
“सुकरतिया” शब्द संस्कृत के “सुकृत” (या “सुकर्त”) से निकला माना जाता है, जिसका अर्थ है अच्छा कर्म, शुभ कार्य, या सुखद कर्मफल। दीपावली तो वैसे भी “सदकर्म और प्रकाश की विजय” का पर्व है — अतः “सुकरतिया” इसका लोकसंस्करण है, जिसका अर्थ हुआ — सुख देने वाली रात, शुभ कर्मों की रात।
अंग प्रदेश में जब खेतों की फसलें पकने लगती हैं, घर-आँगन लीप-पोतकर सजाए जाते हैं, तब गाँव की गलियों में दीयों की पंक्तियाँ और लोगों के चेहरे दोनों एक साथ चमक उठते हैं। यही वह बेला होती है, जब हर मन कह उठता है —
“आज है सुख की रात — सुकरतिया!”
भाषाई दृष्टि से भी यह शब्द रोचक है। लोक उच्चारण में “सुख की रात” या “सुखरात” धीरे-धीरे “सुखरतिया”, फिर “सुकरतिया” बन गया। ग्रामीण बोलचाल ने इस शब्द को इतना अपनाया कि अब यह दीपावली का ही पर्याय बन चुका है। गाँव-देहात में आज भी बुज़ुर्ग कहते हैं — “ए साल के सुकरतिया में घर चमक गेल!” — और यह वाक्य अपने आप में दीपों की पूरी परंपरा को उठाता है।
भाषाई समन्वय: अंगिका भाषा पर संस्कृत का गहरा प्रभाव रहा है, और “सुकरतिया” उसी समन्वय का उदाहरण है। लोकपरंपरा की निरंतरता: पीढ़ी दर पीढ़ी यह शब्द लोक स्मृति में गूँजता रहा है, जिससे यह केवल शब्द नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा बन गया है।
इस प्रकार, “सुकरतिया” न केवल दीपावली का स्थानीय नाम है, बल्कि अंग प्रदेश की मिट्टी, बोली और भावनाओं की गंध से सराबोर एक लोक-संवेदन है। यह नाम बताता है कि दीपावली केवल दीपों का नहीं, सुख, समृद्धि और सुकर्म की ज्योति फैलाने का पर्व है।
तो जब अगली बार आप अंग की धरती पर दीपावली की रात को दीयों की कतारों में नहाए गाँव को देखें, और कोई कहे —
“आज सुकरतिया है रे!”
तो समझिए — वह केवल त्योहार की सूचना नहीं दे रहा, बल्कि एक जीवनदर्शन का उद्घोष कर रहा है —
“दीया जलेॅ आँगनोॅ में, उजियारा होलैय पूरा गाँव में,
सुकरतिया के रतिया में सुख फूटे सभ्भे गांव में।”

हार्दिक शुभकामनाओं के साथ….

लेखक डॉ.आलोक प्रेमी, भदरिया, भागलपुर से हैं।