पर्यावरण: एक विश्वव्यापी समस्या
सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानव की आवश्यकताएँ बढ़ती गईं और वह प्रकृति का क्रूरता से दोहन करने लगा। परिणामस्वरूप प्रकृति असंतुलन की स्थिति में पहुँच गई। विकास की अंधी दौड़ और भौतिक सुख-साधनों की तीव्रता के नए-नए प्रयोगों के फलस्वरूप पर्यावरणीय असंतुलन की समस्या जटिल से जटिलतर बनती गई।

पर्यावरण में भूमि, जल, अग्नि, आकाश और वायु—सभी का समावेश है, जो भौतिक अथवा जैविक रूप से पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। अतः अपने ही अस्तित्व को बनाए रखने के लिए पर्यावरण की रक्षा अनिवार्य है। पर्यावरण के संतुलन में जरा-सी चूक से कई का बाहुल्य, अत्यधिक कृषि की स्थिति, वृक्षों का फैलाव, तथा औद्योगिक तंत्र परिवर्तन जैसी घातक प्रक्रियाएँ संभव हैं।
पिछले कुछ दशकों में पर्यावरण की समस्या ने विश्वभर में जनमानस का ध्यान आकर्षित किया है। पृथ्वी धीरे-धीरे पर्यावरण की विषमजनों समस्याओं से घिरती जा रही है। भारत में वर्ष 1952 में हमारा भारत भी वन नीति का प्रतिपादन किया गया था, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय वन क्षेत्र को कुल भूमि के एक-तिहाई भाग पर वन लगाने का था। पर्यावरण संरक्षण की भारतीय परंपरा वैदिक काल से प्राचीन ऐतिहासिक काल के साथ-साथ चलती आई है।
वेदों में—पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि आदि की पूजा के लिए किए जाने वाले यज्ञों में जीव-जंतुओं की आहुति का एक प्रयोजन वायु का शुद्धिकरण भी था।
वर्तमान वैज्ञानिक युग में मानव सभ्यता जिस तेजी के साथ जीने के नए-नए साधनों, प्रौद्योगिकी की खोज करती जा रही है और उन पर गर्वित हो रही है, उस तेजी के साथ उसका प्राकृतिक परिवेश भी दूषित होता जा रहा है। परिणामस्वरूप उसके जीवन का संकट गहराता जा रहा है। हमारे वैज्ञानिक विभिन्न आविष्कारों, कल-कारखानों, दैनिक जीवन में काम आने वाले अत्याधुनिक उपकरण एवं जीवन की सुविधा सुख पहुँचा रहे हैं, दूसरी ओर उनके ही कारण दिन-प्रतिदिन अपने पर्यावरण की क्षति भी कर रहे हैं।
यदि पर्यावरण प्रदूषण के अभी समाधान नहीं किए गए तो समय ऐसा आएगा जब हमारा यह ग्रह रहने योग्य नहीं रहेगा। बढ़ती हुई गर्मी और ओजोन की परत के क्षरण के कारण भूकंप-तूफान तथा दूर-दूर तक फैलने वाली महामारी और विविध हुई तापमानों के कारण प्रकृति अपने तंत्र-तंत्र के विघटन की ओर बढ़ती जाएगी।
इस दुष्परिणाम की साक्षी होगी युवा पीढ़ी और इसका फल भोगेगी भावी पीढ़ियाँ। अतः मानव के हित में इसके प्रति प्रतिबद्धता, जागरूकता और इसका उपचार अनिवार्य आवश्यकता है।


