रथयात्रा आज: यात्रा में शामिल होते हैं 3 विशाल रथ, विशेष है भगवान जगन्नाथ का रथ
भारत एक ऐसा देश है जहां धर्म, भक्ति और उत्सव का गहरा रिश्ता है। इन्हीं में से एक अनोखा पर्व है, श्री जगन्नाथ रथ यात्रा। यह ऐसा पर्व है जिसमें भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं, अपने रथ पर सवार होकर, सड़कों पर चलकर, हजारों-लाखों श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं।

रथ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, यह एक भावनात्मक जुड़ाव, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक एकता का अद्भुत उदाहरण है। पुरी की यह यात्रा न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में देखी जाती है और हर साल इसकी भव्यता और श्रद्धा में इजाफा होता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा विशाल रथों में बैठकर मंदिर से बाहर आते हैं और विशेष मार्ग से गुंडिचा मंदिर तक की यात्रा करते हैं। यह वह समय होता है जब करोड़ों भक्त ‘जय जगन्नाथ’ के नारे लगाते हुए रथ खींचते हैं, आंसुओं के साथ भगवान के दर्शनों का लाभ लेते हैं और अपने हृदय को निर्मल अनुभव से भर लेते हैं।
रथ यात्रा सिर्फ एक तीर्थयात्रा नहीं है, यह सामाजिक समरसता और समानता का संदेश देती है। इसमें राजा से लेकर रंक तक, सभी एक जैसे भागीदार बनते हैं। भगवान का रथ खींचने का अधिकार हर जाति, धर्म और वर्ग को समान रूप से प्राप्त है। यह यात्रा इस बात की प्रतीक है कि ईश्वर सभी के लिए समान हैं और भक्तिभाव ही सबसे बड़ी पहचान है। इसी वजह से इस यात्रा में भाग लेना न केवल धार्मिक कार्य है, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द का भी प्रतीक बन गया है। इस बार आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 27 जून को है। पंचांग के अनुसार, 27 जून को सुबह 5:25 बजे से 7:22 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग है। इसके बाद पुष्य नक्षत्र. आज का शुभ समय दोपहर 11:56 से 12:52 तक है, जिसे अभिजीत मुहूर्त कहा जाता है। इसी समय भगवान की यात्रा शुरू होती है। पुरी की रथ यात्रा भारत के पर्यटन को एक वैश्विक पहचान भी देती है। इस उत्सव के दौरान लाखों देशी-विदेशी पर्यटक पुरी आते हैं और भारत की जीवंत संस्कृति, रंग-बिरंगे परिधान, लोकगीतों, वाद्य यंत्रों और मंदिरों की दिव्यता से प्रभावित होते हैं। रथ यात्रा न केवल धर्म का प्रसार करती है, बल्कि ओडिशा की संस्कृति, हस्तशिल्प, भोजन और जीवनशैली को भी दुनिया तक पहुंचाती है।


