राष्ट्रीय

8 जुलाई: ज्योति बसु की जयंती एवं सुभाष मुखोपाध्याय की पुण्यतिथि

ज्योति बसु अथवा ‘ज्योतिंद्र बसु’ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के अग्रणी नेताओं में से एक थे, जिन्होंने पश्चिम बंगाल में 23 वर्ष तक लगातार मुख्यमंत्री रहकर संसदीय राजनीति में विशेष ख्याति पायी। आज ही के दिन 8 जुलाई, 1914 को कोलकाता में उनका जन्म हुआ था। सुभाष मुखोपाध्याय भारत के बांग्ला कवि और साहित्यकारों में से एक थे। सन 1991 में सुभाष मुखोपाध्याय को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। आज ही के दिन 8 जुलाई, 2003 को उनकी मृत्यु हुई थी।

भारत में कम्युनिस्ट राजनीति को स्थापित करने वालों में से ज्योति बसु एक रहे। वे रेल कर्मचारियों के आंदोलन में शामिल होने के बाद पहली बार में वे चर्चा में आए और 1957 में पश्चिम बंगाल विधानसभा में वे विपक्ष के नेता चुने गए। उनके कार्यकाल में, उनकी सरकार ने राज्य में कई उपलब्धियाँ दर्ज कीं जिनमें प्रमुख है नक्सलवादी आंदोलन से बंगाल में पैदा हुई अस्थिरता को राजनीतिक स्थिरता में बदलना। उनकी सरकार का एक और उल्लेखनीय काम है भूमि सुधार, जो दूसरे राज्यों के किसानों के लिए आज भी एक सपना है। ज्योति बसु की सरकार ने जमींदारों और सरकारी कब्ज़े वाली ज़मीनों का मालिक़ाना हक़ क़रीब 10 लाख भूमिहीन किसानों को दे दिया। इस सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों की ग़रीबी दूर करने में भी काफ़ी हद तक सफलता पाई। देश में सबसे लंबे समय तक किसी राज्य का मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल करने वाले ज्योति बसु ने 17 जनवरी, 2010 को कोलकाता के एक अस्पताल में अंतिम सांस लीं। सन 1991 में सुभाष मुखोपाध्याय को ज्ञानपीठ पुरस्कार, 2003 में उन्हें भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में योगदान हेतु ‘पद्म भूषण’ से भी सम्मानित किया गया। उनका जन्म 12 फ़रवरी सन 1919 को कृष्णानगर, बंगाल प्रेसीडेंसी में हुआ था। सन 1940 में एक छात्र रहते हुए सुभाष मुखोपाध्याय ने ‘पदाटिक’ कविता का अपना पहला खंड प्रकाशित किया। यह कवियों की पिछली कल्लोल पीढ़ी से एक स्पष्ट प्रस्थान का प्रतिनिधित्व करता है और उनकी विशिष्ट, सीधी आवाज, उनके तकनीकी कौशल और कट्टरपंथी विश्व-दृष्टि से संबद्ध, ने उन्हें बहुत लोकप्रियता दिलाई। उन्होंने अपनी कविता में उस युग की भारी उथल-पुथल का सामना किया, जिसने बंगाली समाज को ऊपर से नीचे तक तोड़ दिया। पद्य के अलावा उन्होंने उपन्यास, निबंध और यात्रा वृत्तांत सहित गद्य की रचनाएँ भी लिखीं। वह पत्रकारिता में भी सक्रिय थे, उन्होंने दैनिक और साप्ताहिक समाचार पत्रों के संपादकीय कर्मचारियों में सेवा की। वह प्रमुख बंगाली साहित्यिक पत्रिका ‘परिचय’ के संपादक थे। वह बच्चों के लिए एक कुशल और लोकप्रिय लेखक भी थे। उन्होंने साठ के दशक की शुरुआत में कुछ वर्षों के लिए सत्यजीत रे के साथ संयुक्त रूप से बंगाली बच्चों की पत्रिका ‘संदेश’ का संपादन किया।

pradip singh Deo
लेखक डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव