8 जुलाई: भारत के 8वें प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की पुण्यतिथि
चन्द्र शेखर सिंह भारत के आठवें प्रधानमंत्री थे। उनकी मृत्यु आज ही के दिन 8 जुलाई, 2007 को हुई थी। चंद्रशेखर जी को युवा तुर्क का सम्बोधन उनकी निष्पक्षता के कारण प्राप्त हुआ था। वह मेधा प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। ऐसे बहुत ही कम लोग होते हैं, जिन्हें विधाता कई योग्यता देकर पृथ्वी पर भेजता है और चंद्रशेखर का शुमार उन्हीं व्यक्तियों में करना चाहिए। विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद चंद्रशेखर ने ही प्रधानमंत्री का पदभार सम्भाला। वह आचार्य नरेंद्र देव के काफ़ी समीप माने जाते थे। उनके व्यक्तित्व एवं चरित्र से इन्होंने बहुत कुछ आत्मसात किया था। एक सांसद के रूप में चंद्रशेखर का वक्तव्य पक्ष और विपक्ष दोनों बेहद ध्यान से सुनते थे। इनके लिए प्रचलित था कि यह राजनीति के लिए नहीं बल्कि देश की उन्नति की राजनीति हेतु कार्य करने में विश्वास रखते हैं। चंद्रशेखर आत्मा की आवाज़ पर प्रशंसा और आलोचना करते थे। तब यह नहीं देखते थे कि वह ऐसा पक्ष के प्रति कर रहे हैं अथवा विपक्ष के प्रति। लेकिन देश को इस सुयोग्य व्यक्ति से अधिकाधिक उम्मीदें थीं, जो निश्चय ही राजनीतिक व्यवस्था के कारण प्राप्त नहीं की जा सकीं।

उनका जन्म 1 जुलाई, 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के ग्राम इब्राहीमपुर में हुआ था।
स्नातकोत्तर करने के बाद चंद्रशेखर समाजवादी आन्दोलन से जुड़ गए। वह पहले बलिया के ज़िला प्रजा समाजवादी दल के सचिव बने और एक वर्ष के बाद राज्य स्तर पर इसके संयुक्त सचिव बन गए। वह 1962 में राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर तब आए जब उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चयनित हुए। इस समय तक चंद्रशेखर ने वंचितों और दलितों के कल्याण की पैरवी करते हुए उत्तर प्रदेश सहित कई प्रान्तों में अपनी प्रभावी पहचान बना ली थी। इस समय उनकी उम्र मात्र 35 वर्ष थी। चंद्रशेखर की एक विशेषता यह थी कि वह गम्भीर मुद्दों पर सिंह के समान गर्जना करते हुए बोलते थे। उनकी वाणी में इतनी शक्ति थी कि जब संसद मछली बाज़ार बन रहा होता था तो वहाँ पर सन्नाटा पसर जाता था। चंद्रशेखर को मुद्दों की राजनीति के लिए जाना जाता है। यही कारण है कि विपक्षी नेताओं के साथ उनके मधुर सम्बन्ध रहे। विपक्ष के नेता गतिरोध की स्थिति में उनसे परामर्श और मार्गदर्शन प्राप्त करते थे।
विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद चंद्रशेखर ही काँग्रेस (आई) के समर्थन से सत्तारूढ़ हुए। इन्हें 10 नवम्बर, 1990 को राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरामण ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। प्रधानमंत्री बनने के बाद चंद्रशेखर ने बेहद संयमित रूप से अपने दायित्वों का निर्वाह किया। वह जानते थे कि काँग्रेस इं के समर्थन से ही इनकी सरकार टिकी हुई है। यह भी सच है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह जिस प्रकार के प्रधानमंत्री साबित हो रहे थे, उसे देखते हुए उन्होंने कांग्रेस की बात पर विश्वास किया कि वह उसके समर्थन से सरकार बना सकते हैं। लेकिन चंद्रशेखर कभी इस भुलावे में नहीं थे कि राजीव गांधी लम्बे समय तक उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने देंगे। देश को मध्यावधि चुनाव से बचाने के लिए भी वह प्रधानमंत्री बने थे। विदेशी मुद्रा संकट होने पर चंद्रशेखर ने स्वर्ण के रिजर्व भण्डारों से यह समस्या सुलझाई। कुछ ही समय में स्वर्ण के रिजर्व भण्डार भर गए और विदेशी मुद्रा का संतुलन भी बेहतर हो गया।


