सिनेमा

कर चले हम फिदा… के संगीत निर्देशक मदन मोहन की 50वीं पुण्यतिथि आज

मदन मोहन हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। अपनी गजलों के लिए प्रसिद्ध इस संगीतकार का पूरा नाम ‘मदन मोहन कोहली’ था। आज ही के दिन 14 जुलाई, 1975 को उनकी मृत्यु हुई थी। अपनी युवावस्था में मदन मोहन एक सैनिक थे। बाद में संगीत के प्रति अपने झुकाव के कारण ऑल इंडिया रेडियो से जुड़ गए। तलत महमूद तथा लता मंगेशकर से उन्होंने कई यादगार गज़लें गंवाईं, जिनमें “आपकी नजरों ने समझा, प्यार के काबिल मुझे” जैसे गीत शामिल हैं।

मदन मोहन 1950, 1960 और 1970 के दशक में बॉलीवुड फ़िल्म संगीत के ख्यातिप्राप्त निर्देशक थे। उनका जन्म 25 जून 1924 बगदाद, इराक में हुआ था। उन्होंने सेना में भर्ती हुई और देहरादून में नौकरी शुरू कर दी। लेकिन कुछ समय के बाद उनका मन सेना की नौकरी में नहीं लगा और वह नौकरी छोड़ लखनऊ आ गये। वहाँ वे आकाशवाणी के लिये काम करने लगे जहाँ उनकी मुलाकात संगीत जगत् से जुडे़ उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ाँ, उस्ताद अली अकबर ख़ाँ, बेगम अख़्तर और तलत महमूद जैसी जानी मानी हस्तियों से हुई। इन हस्तियों से मुलाकात के बाद उनका रुझान संगीत की ओर हो गया। मुंबई आने के बाद उनकी मुलाकात एस. डी. बर्मन, श्याम सुंदर और सी. रामचंद्र जैसे प्रसिद्ध संगीतकारों से हुई और वह उनके सहायक के तौर पर काम करने लगे। उनके संगीत निर्देशन में आशा भोंसले ने फ़िल्म ‘मेरा साया’ के लिये ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में’.. गाना गाया जिसे सुनकर श्रोता आज भी झूम उठते हैं।

मदन मोहन से आशा भोंसले को अक्सर यह शिकायत रहती थी कि- आप अपनी हर फ़िल्मों के लिये लता दीदी को हीं क्यो लिया करते है, इस पर वे कहा करते थे जब तक लता ज़िंदा है मेरी फ़िल्मों के गाने वही गायेगी। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म हकीकत में मोहम्मद रफी की आवाज़ में उनके संगीत से सज़ा यह गीत ‘कर चले हम फिदा जानों तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’…आज भी श्रोताओं में देशभक्ति के जज्बे को बुलंद कर देता है। आंखों को नम कर देने वाला ऐसा संगीत सिर्फ वे ही दे सकते थे। वर्ष 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म दस्तक के लिये वे सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किये गये। उन्होंने अपने ढ़ाई दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 100 फ़िल्मों के लिये संगीत दिया।

pradip singh Deo
लेखक डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव