दुमका (शहर परिक्रमा)

“अगस्त क्रांति और झारखंड” विषय पर एकदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन


दुमका: स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम अध्याय अगस्त क्रांति की 82वीं वर्षगांठ के अवसर पर शुक्रवार को संताल परगना महाविद्यालय, दुमका के इतिहास विभाग ने “अगस्त क्रांति एवं झारखंड” विषय पर एक भव्य एवं ज्ञानवर्धक एकदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया। इस आयोजन का उद्देश्य छात्र-छात्राओं एवं स्थानीय नागरिकों को अगस्त क्रांति के महत्व, उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और स्वतंत्रता संग्राम में उसकी निर्णायक भूमिका से अवगत कराना था। कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ.के .पी .यादव द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। मंच पर विभागाध्यक्ष डॉ. सुमित्रा हेम्ब्रम, मुख्य अतिथि सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय के इतिहास स्नातकोत्तर विभाग से डॉ. अमिता कुमारी, तथा कॉलेज कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ कुमार सौरभ ने उपस्थिति दर्ज कराई।

प्राचार्य डॉ. यादव ने अपने उद्घाटन संबोधन में कहा –
“अगस्त क्रांति केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि यह भारत की स्वतंत्रता यात्रा का वह निर्णायक मोड़ था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी। आज हमें न केवल उस इतिहास को याद रखना है, बल्कि उसके आदर्शों को भी अपनाना है।” इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. सुमित्रा हेम्ब्रम ने अगस्त क्रांति के पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 8 अगस्त 1942 को बंबई (अब मुंबई) में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिवेशन में महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया, जिसने पूरे देश में आज़ादी की लौ प्रज्वलित कर दी। उन्होंने यह भी बताया कि झारखंड क्षेत्र, विशेषकर संताल परगना में इस आंदोलन की गूंज दूर-दूर तक सुनाई दी, जहां के वीर सपूतों ने जेल यातनाएं सहीं और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध डटकर संघर्ष किया। मुख्य वक्ता डॉ. अमिता ने अपने व्याख्यान में विद्यार्थियों को स्थानीय संदर्भों से जोड़ते हुए कहा –
“संताल परगना का योगदान अगस्त क्रांति में अद्वितीय रहा है। यहां के आदिवासी और किसान समुदाय ने न केवल अंग्रेजी सरकार के आदेशों का बहिष्कार किया, बल्कि आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई।
अगस्त क्रांति : एक ऐतिहासिक विश्लेषण, झारखंड में अगस्त क्रांति की प्रतिध्वनि, महात्मा गांधी के नेतृत्व में जनआंदोलन जैसे कई महत्वपूर्ण विषय पर मोहित कुमार, राखी कुमारी, मिलान रजक, सीमा कुमारी समेत दर्जनों विद्यार्थियों ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। कार्यक्रम के अंत में डॉ. अविनाश हांसदा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और सभी अतिथियों, प्रतिभागियों तथा आयोजकों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ. कुमार सौरभ ने कहा कि इस तरह के आयोजन युवा पीढ़ी को अपने अतीत से जोड़ने और राष्ट्रभक्ति की भावना प्रबल करने में अत्यंत सहायक हैं। डॉ. रूपम कुमारी ने कहा कि यह संगोष्ठी न केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम रहा, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव के रूप में भी उभरा, जिसमें इतिहास और साहित्य का सुंदर संगम देखने को मिला। संताल परगना महाविद्यालय ने इस आयोजन के माध्यम से यह संदेश दिया कि भारत की स्वतंत्रता की गाथा केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन का प्रेरणास्रोत है जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत रखना हमारी जिम्मेदारी है। कार्यक्रम का नेतृत्व इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. कमल शिवकांत हरि ने किया जबकि कार्यक्रम का आकर्षण मंच संचालन था जिसे इतिहास विभाग के विद्वान शिक्षक डॉ. सत्यम कुमार द्वारा संचालित किया गया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ किया गया।

संवाददाता:- आलोक रंजन