राष्ट्रीय

महात्मा गाँधी और उनके हत्यारे

     महात्मा गाँधी ने सीने में गोली नहीं खायी उन्होंने अपनी विचारधरा का मूल्य चुकाया और उस हत्यारे ने ट्रिगर नहीं दबाया था वह अपने नफरत, विद्वेष, असहिष्णुता की पूरी पीढ़ी उतार रहा था। आज मुठ्ठी भर लोग उसे देशभक्त कहकर सजदा करते हैं असल में वे हत्यरे पूजक हैं। उनके लिए अहिंसा कोई विचार नहीं, बस एक कमजोरों का नाटक हो।
    उस हत्यारे की गोली ने महात्मा गाँधी को नहीं मारा, उसे तो नफरत ने पहले ही मार डाला था। अब विडंबना देखिये जिस महत्मा ने मरते-मरते “हे राम“ कहा, आज वही लोग कोसते हैं, जिनके लिए “जय श्री राम” सिर्फ एक नारा है डर पैदा करने का, आचरण नहीं। ऐसे ही लोगों के बारे में कहावत प्रचलित है “मुख में राम बगल में छुरी।”

    आजाद भारत के पहले आतंकवादी हत्यारे गिरोह ने अपनी नफरत, विद्वेष, असहिष्णुता, घृणा को एक बूढ़े संत महात्मा पर उतरा, क्योंकि वे लोग और उनके पीछे खड़े स्वयंभू लोग गाँधी जी को बहस में या तर्क में आदर्श में हरा नहीं सकते थे। महात्मा के किसी विचारधारा की लडाई में उनके चरण धूलि भर नैतिक ऊँचाई तक भी नहीं पहुँच सकते थे।
     उन आतंकी लोगों की समस्या महात्मा गाँधी नहीं थे, उनलोगों की समस्या उस उस छवि से थी जो गाँधी जी उन्हें दिखाते थे और उनके अनुयायियों द्वारा हत्यारे पूजकों को दिखाया जा रहा है कि नफरत, विद्वेष, असहिष्णुता, कितनी बौनी, गन्दी नाली के बजबजाते पिल्लू और कितनी कायर तथा कमजोर चीज है।
उस हत्यारे ने गोली चलायी, क्योंकि शब्दों में दम नहीं थे। विचारों की लडाई में उस फटे हुए ढोल की तरह खोखला और अंधकारमय था। उसके पास पिस्टल था और दिमाग नफरत, घृणा, विद्वेष कुंठा में जलकर भाष्मिभुत हो चूका था।
     वे सोचते थे कि महात्मा गाँधी को मार कर वह देश का रक्षक बन जायेगा। सच तो यह है कि जो कायर, प्रार्थना के लिए जा रहे, वो भी किसी के सहारे, उस बूढ़े व्यक्ति से डरकर गोली चला दे, वह रक्षक नहीं भक्षक, दर का दास, नफरत का सेवक, पथभ्रष्ट और इतिहास का सबसे निकृष्ट कायर होता है।
      उस हत्यारे के पूजक यह भूल जाते हैं कि अगर बातों में सच्चाई होती, तो गाँधीजी से बहस करता, उनके विचारों को चुनौती देता। पर नहीं, वह जनता था कि गाँधीजी को तर्क से नहीं बल्कि सीने पर गोली चला कर ही चोट पहुंचाई जा सकती है। वह गांधीजी के विचारों से इतना भयभीत था कि उसने सोचा “इन्हें ख़त्म कर दो वरना हमारी नफ़रत, विद्वेष, असहिष्णुता, हिंसा, वैमनस्यता, घृणा और कट्टरता का धंधा नहीं चल पायेगा।”
     हाँ उस आतंकी गिरोह ने गांधीजी को इसलिए नहीं मारा क्योंकि वह “देशभक्त” था। उनलोगों ने गाँधीजी मारा और जिनलोगों ने मरवाया क्योंकि गांधीजी जैसा महात्मा उनके जैसी सड़ी हुई विद्रूप मानसिकता के लिए सबसे बड़ा खतरा था।
     महात्मा गाँधी की हत्या उस दिन नहीं हुई थी ज़ब उन आतंकवादी गिरोह और उसके समर्थकों और पोषकों के विवेक का क़त्ल वहीँ शुरू हुआ था। अगर एक संत की छाती में गोली मरने वाला आतंकी हत्यारों का गिरोह आज भी किसी का नायक या देवता है तो दोष उन हत्यारों का दोष नहीं बल्कि उस मानसिक दिवालियापन या विक्षिप्तता और विद्रूपता का है जो आज भी नफरत और विद्वेष को वीरता समझता है।
      उन हत्यारों के गिरोह की गोली ने गांधीजी का शरीर गिराया, पर उनके विचारों को छु नहीं सकी।
     गाँधीजी आज दुनियां भर में जीवित हैं। आज दुनियां में उनको एक महान संत महात्मा का दर्जा प्राप्त है। वे अब एक विशाल संस्थान बन गए हैं। दुनियां के सैंकड़ों देशों में उनकी मूर्ति लगी है। हर पुस्तकालय में उनकी किताबें हैं। हर विश्विद्यालय में उनको पढाया जाता है उनपर अनगिनत शोध हो चुके हैं और हो ही रहे हैं। और वो हत्यारा इतिहास के अँधेरे कोने में अपनी कायरता, घृणा का बोझ के तले दबा हुआ है।

लेखक सचिन्द्र नाथ झा