इंदिरा गांधी एवं रानी लक्ष्मीबाई आज भी महिलाओं की प्रेरणास्रोत हैं: स्नेहा केशरी
देवघर: आज सम्पूर्ण भारत में हमारे प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी एवं स्वतंत्रता सेनानी रानी लक्ष्मीबाई की जयंती मनाई जा रही है। इन्दिरा का जन्म 19 नवम्बर 1917 को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली नेहरू परिवार में हुआ था। लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले में 19 नवम्बर 1828 को एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

इसी कड़ी में स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान तथा दीनबंधु उच्च विद्यालय के युग्म बैनर तले दोनों महान विभूतियों की जयंती मनाई गई। इंदिरा गाँधी की देन, शीर्षक भाषण प्रतियोगिता में दीनबंधु उच्च विद्यालय की आस्था कुमारी, आकृति कुमारी एवं साक्षी सिंह ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्थान प्राप्त किया। रंगभरो प्रतियोगिता में संत मेरी गर्ल्स हाई स्कूल की दिव्या कुमारी को प्रथम व अन्य शिक्षण संस्थान के रश्मि आनंद एवं अभय कुमार को क्रमशः द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। श्रीमती इंदिरा गाँधी की देन, शीर्षक निबंध लेखन प्रतियोगिता में दिव्या कुमारी को प्रथम, जसीडीह की अलका कुमारी एवं प्रियंका भारती को क्रमशः द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। साथ ही तक्षशिला विद्यापीठ की श्रेया मिश्रा, देवघर महाविद्यालय की परी गुप्ता, ए. एस. कॉलेज के शिवांश केशरी को मुख्य अतिथि कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में शिरकत करने वाली स्नेहा केशरी, विवेकानंद संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव एवं दीनबंधु स्कूल के प्रधानाध्यापक काजल कांति सिकदार के करकमलों से पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम के अंत में स्नेहा केशरी को मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया।
मौके पर स्नेहा केशरी ने कहा कि इंदिरा गांधी को 1960 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। अपने पिता की मौत के बाद इंदिरा गांधी को सुचना और प्रसारण मंत्री बनाया गया। जब पिता के बाद लाल बहादुर शाष्त्री प्रधानमंत्री बने और 1966 में शास्त्री की मौत के बाद उन्हें कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री मंत्री बनने के बाद एक शशक्त नेता बनकर उभरी। प्रधानमंत्री पद ग्रहण करते ही इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम रेडियो पर संदेश दिया था कि “हम शान्ति चाहते है क्योंकि हमे दुसरी लड़ाई नहीं लड़नी है। इसके तुंरत बाद 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ जिसमे पाकिस्तानी सेना ने समपर्ण कर दिया जिसके फलस्वरूप इंदिरा गांधी ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति को शिमला समझौते पर हस्ताक्षर करवाए। इस समझौते के तहत कश्मीर विवाद को सुलझाया गया। इंदिरा गांधी की वजह से बंगलादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। इंदिरा गांधी ने ही हरित क्रांति को जन्म दिया। डॉ. देव ने रानी लक्ष्मीबाई के सन्दर्भ में कहा-अंग्रेजों के खिलाफ रानी लक्ष्मीबाई की जंग में कई और अपदस्त और अंग्रेजी हड़प नीति के शिकार राजाओं जैसे बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तात्या टोपे आदि सभी महारानी के इस कार्य में सहयोग देने का प्रयत्न करने लगे। सन 1858 के जनवरी महीने में अंग्रेजी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च में शहर को घेर लिया। लगभग दो हफ़्तों के संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने शहर पर कब्जा कर लिया पर रानी लक्ष्मीबाई अपने पुत्र दामोदर राव के साथ अंग्रेजी सेना से बच कर भाग निकली। झाँसी से भागकर रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिलीं। तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई की संयुक्त सेना ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने जी-जान से अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया पर 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गयीं। काजल कांति सिकदार ने कहा- 31 अक्टूबर सन 1984 का दिन बहुत ही दुर्भाग्य वाला दिन था. इस दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी अपने ही अंगरक्षकों के हाथो द्वारा गोली से मारी गई. इन्होने अपने एक-एक खून का कतरा देश के लिए बहाया. जो बलिदान इन्होंने दिया वह हमेशा ही अमर रहेगा. इन्दिरा गांधी एक ऐसी महिला थीं, जो न केवल भारतीय राजनीति पर छाई रहीं बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी वह विलक्षण प्रभाव छोड़ गई। उन्हें लौह महिला के नाम से भी संबोधित किया जाता है। अपनी प्रतिभा और राजनीतिक दृढ़ता के लिए ‘विश्वराजनीति’ के इतिहास में इन्दिरा गांधी का नाम सदैव याद रखा जायेगा। रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झॉसी राज्य की रानी थीं और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकुमत के विरुद्ध बिगुल बजाने वाले वीरों में से एक थीं। वे ऐसी वीरांगना थीं जिन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में ही ब्रिटिश साम्राज्य की सेना से मोर्चा लिया और रणक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हो गयीं परन्तु जीते जी अंग्रेजों को अपने राज्य झाँसी पर कब्जा नहीं करने दिया।

