वन्दे मातरम् गीत के 150 साल पर आयोजित हुआ वार्षिक कार्यक्रम
देवघर: वंदे मातरम’ गीत ने अपने रचना के 150 वर्ष पूरे कर लिए हैं, जिसे 7 नवंबर 1875 को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने रचा था और इसी उपलक्ष्य में भारत सरकार द्वारा 7 नवंबर, 2025 से 7 नवंबर, 2026 तक देशव्यापी समारोहों का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ने उद्घाटन किया और एक स्मारक डाक टिकट व सिक्का भी जारी किया, ताकि इस ऐतिहासिक गीत की भावना को युवाओं तक पहुँचाया जा सके।

इसी क्रम में विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के बैनर तले, होटल न्यू ग्रैंड स्थित पैराडाइस बैंक्वेट हॉल के भव्य सभागार में इसकी शुरुआत की गई जो सन 2026 तक देश के विभिन्न स्थानों में मनाया जायेगा। आज लगभग 130 व्यक्तिओं को वन्दे मातरम मोमेंटो संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव, मुख्य अतिथि फ़ूड क्राफ्ट इंस्टिट्यूट, देवघर के प्राचार्य डॉ. नृपेंद्र सिंह लिंगवाल, देवघर चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष रवि कुमार केशरी, झारखण्ड प्राइवेट स्कूल्स एसोसिएशन, देवघर जिला के अध्यक्ष डॉ. जय चंद्र राज, समाजसेवी रीता चौरसिया, विजया सिंह, आईआईटियन ई. नरेश प्रसाद सिंह, लेखक प्रशांत कुमार सिन्हा, पर्यावरणविद रजत मुखर्जी व अन्य के करकमलों से प्रदान किया गया।
मौके पर डॉ. देव ने कहा- ‘वन्दे मातरम्’ भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसके प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बंगाली भाषा में हैं। इसका स्थान राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के बराबर है। मुख्य वक्ता डॉ. जे. सी. राज ने कहा- वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गीत है जिसकी रचना बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा की गई थी। इन्होंने 7 नवम्बर, 1876 ई. में बंगाल के कांतल पाडा नामक गाँव में इस गीत की रचना की थी। वंदे मातरम् गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला भाषा में थे। राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया और पहली बार 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत गाया गया। अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया। ‘वंदे मातरम्’ का स्थान राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के बराबर है। यह गीत स्वतंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था। रीता चौरसिया ने कहा-गीत के पहले दो छंदों में मातृभूमि की सुंदरता का गीतात्मक वर्णन किया गया है, लेकिन 1880 के दशक के मध्य में गीत को नया आयाम मिलना शुरू हो गया। एकेएसडी आवासीय विद्यालय, मोहनपुर के सचिव पालन झा ने कहा- बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ तो बहुत लम्बी रचना है, जिसमें माँ दुर्गा की शक्ति का भी बख़ान है, पर पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है और इसे राष्ट्रीय गीत का दर्ज़ा देकर इसकी न केवल धुन बल्कि गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है, जो 52 सेकेण्ड है। इस तरह लगता है कि ‘राष्ट्रीय गान’ और ‘राष्ट्रीय गीत’ के न सिर्फ़ राग बल्कि इसमें बजने वाले साज़ भी लगभग तय है। मातृ मंदिर बालिका उच्च विद्यालय की पूर्व प्रधानाध्यापिका शोभना सिंह ने कहा- सन 1905 के बंगाल के स्वदेशी आंदोलन ने वंदे मातरम् को राजनीतिक नारे में तब्दील कर दिया। ब्लू बेल्स स्कूल की प्राचार्या पूनम झा ने कहा- कांग्रेस के अधिवेशनों के अलावा भी आज़ादी के आंदोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफ़ी उदाहरण मौजूद हैं।
कार्यक्रम के दौरान रीता चौरसिया, विजया सिंह, रूपा केशरी, ब्राइट कैरियर स्कूल के निदेशक अवधेश कुमार सिंह, दीनबंधु उच्च विद्यालय के प्रधानाध्यापक काजल कांति सिकदार, रजत मुखर्जी एवं अन्य ने भी अपनी-अपनी बातें रखी। पूरे कार्यक्रम को सफल बनाने में बीपीजे हाई स्कूल प्लस टू, रिखिया की प्रभारी प्रधानाध्यापिका सुलेखा विश्वास, दीनबंधु स्कूल की शिक्षिका मनीषा घोष, वेक्सो इंडिया के जिलाध्यक्ष सुमन सौरभ, सदस्य विकास केशरी, छात्रा शिवांगी केशरी, ऋषिका झा, इंदु कुमारी, सृष्टि सुमन व अन्य ने अहम भूमिका निभाई कांग्रेस के अधिवेशनों के अलावा भी आज़ादी के आंदोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफ़ी उदाहरण मौजूद हैं।

