प्रकृति: मानव और प्रदूषण
प्रकृति और मानव का सहसंबंध तब से रहा है जब से मानव धरती पर अवतरित हुआ। अपने स्वार्थ हेतु उसने प्रकृति को अव्यवस्थित, परिवर्तित और प्रदूषित किया। विकास की न समाप्त होने वाली चाह प्रौद्योगिकीय संसाधनों के विस्तार की चरम पर ले आई। परिणामस्वरूप हमारी अति शीघ्र का परिणाम ही प्रदूषण है। प्रदूषण का तात्पर्य मनुष्य द्वारा वातावरण की गुणवत्ता में गिरावट है। यह सच है, “मानव के कार्यकलापों से ऊर्जा विकिरण, रासायनिक एवं भौतिक तत्त्वों में प्रतिकूल परिवर्तन ही प्रदूषण है।”

समाज में औद्योगिक नगरीकरण के विकसित होने का परिणाम पूरी मानव जाति को भुगतना पड़ता है। औद्योगिक स्वार्थी प्रकृति का परिणाम प्रदूषण जल, वायु, मिट्टी के रूप में हमारे सामने आया है। प्रथम तो यह है कि जल जीवन का आधार है और यह जल ही है जो पृथ्वी पर ठोस, तरल और वाष्प तीनों रूपों में अपने चक्र को सम्पन्न करके जैव मंडल की सक्रियता प्रदान करता है। यह कहना जरूरी है कि पृथ्वी के कुल जल का केवल 1% ही जीवित समुदाय के लिए भूमिगत जल, नदियों, झीलों के रूप में उपयोगी है। बढ़ती जनसंख्या के कारण इस उपयोगी जल की मांग भी अत्यधिक बढ़ गई और इसी तरफ हमने ऐसे तंत्र मिला दिया जो पूरे जैविक समुदाय के लिए घातक है। वैज्ञानिक समुदाय समिति (USA) ने जल प्रदूषण की इस प्रकार परिभाषित किया है—
“जल प्रदूषण जल के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक विशेषताओं में वह परिवर्तन है जो मानव एवं जलीय प्राणियों पर घातक प्रभाव डालता है।”
भूमिगत जल के प्रदूषण का इतिहास भी काफी पुराना है। अनेक साल पहले कई कुओं में 3500 रोग किटाणुओं का विकास हुआ जिन्होंने कुओं का पानी दूषित किया था। भारी मात्रा में सड़े-गले पदार्थ, रसायन वर्षा के जल के साथ भूमिगत जल में पहुँचते हैं। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे चलती रहती है और भूमिगत जल में घातक पदार्थों का संमिश्रण होता रहता है।
यह प्रदूषित जल मानव, जीव-जंतुओं और वनस्पति के लिए बहुत हानिकारक है। अनेक प्रकार की महामारियाँ और घातक बीमारियाँ दूषित जल के कारण ही फैलती हैं। जल प्रदूषण को रोकने के लिए व्यक्ति विशेष, समुदाय एवं सरकारों को प्रयास करना चाहिए। यह एक सामूहिक जिम्मेदारी है। व्यक्ति विशेष तक प्रदूषित जल के कुप्रभाव की शिक्षा के माध्यम से पहुँचाना समस्त समाज की जिम्मेदारी है। हर उद्योग जो जल का उपयोग करता है उसे अपने क्षेत्र में जल संशोधन प्लांट लगाना चाहिए ताकि उनके द्वारा निष्कासित जल नदियों एवं जलाशयों तक न पहुँचे और उपयुक्त विधियों में सक्षम कानून बनाकर न्यायपालिका भी इस कार्य में सहयोग दे सकती है। भारत सरकार ने इस क्षेत्र में अनेक कदम उठाए हैं। नगरीय और औद्योगिक प्रदूषित जल को संशोधित करके सिंचाई में प्रयोग किया जा सकता है। इस जल और कचरे को मिलाकर कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकती है। आज प्लास्टिक हमारे वातावरण को सर्वाधिक प्रभावित कर रही है। प्लास्टिक के विकल्प महंगे होने के कारण हमारी मानसिकता इन्हें उपयोग करने की सलाह नहीं देती लेकिन भविष्य में यह अवश्य ही हो जाएगा। अन्ततः कहा जा सकता है कि हमारे विकास का एक सह-उत्पाद प्रदूषण भी है, चाहे वह किसी भी रूप में हो।


