उत्सव

मित्रता दिवस विशेष: मित्र और मित्रता

न स सखा यो न ददाति सख्ये- ऋगवेद 10/117/4
   वह मित्र नहीं है, जो साथी को नहीं देता है। मित्र दुःख में हो या सुख में, वह अपने मित्र की सदा ही सहायता करता है। रहीम कवि का कहना है- कहि रहीम संपति संगै, बन बिपत्ति-कसौटी जे कसे, सोई साँचे मौत। बनत बहुत बहुरीत।
    यह सच है, एक निष्ठावान मित्र जीवन की औषधि है। आज हृदय खोलकर मिलने वाले बड़े भाग्य से मिलते हैं।
सज्जनों के साथ सात पग चलने से भी मित्रता हो जाती है। आदि, मध्य और अन्त में एक समान सहृदय भाव सज्जन में ही होता है अन्य पुरुषों में नहीं।

   “विद्या शौर्यँ च दाक्षयंच बलं धैर्य धैर्यँ च पंचमम् ॥ मित्राणि सहजान्या हुर्वर्तयन्तीह तै बर्धाः(वेदव्यास)  

      विद्या, शूरवीरता, दक्षता, बल और धैर्य- ये पाँच मनुष्य के स्वाभाविक मित्र बताए गए हैं। विद्वान पुरुष इनके द्वारा ही जगत के कार्य करते हैं। मित्रता का अर्थ है दो शरीरों में रहती एक आत्मा। यह उत्तम स्वास्थ्य के समान है, उसका महत्व तभी ज्ञात होता है, जब हम उसे खो बैठते है। कबीर का कथन बिलकुल सत्य है कि  
   कबीर तन पेषी भूया, जहाँ मन तह उड़ि जाई।
      जो जैसी संगति करे, सो तैसे फल खाई।”

  जीवन गुजरने के के साथ- साथ यदि कोई व्यक्ति नये परिचय नहीं बनाता तो वह शीघ्र ही स्वयं को एकाकी पाएगा। मनुष्य को अपनी मित्रत्ता निरन्तर सुधारते रहनी चाहिए।
    हम जानते हैं, मित्रता प्रेम में पल्लवीत हो सकती है और वहुधा हो ही जाती है। किन्तु प्रेम कभी बजी घटकर मित्रता में परिवर्तित नहीं’ होता। विश्वास उपकार, सुख-दुख में समान भाव, क्षमा, प्रेम- यही सज्जनों की मित्रता है। रोगी निर्धन, परदेसी और शोक में पीड़ित मनुष्य के लिए मित्र का दर्शन औषध रूप है। चाहे मित्र दुर्बल है, परन्तु यदि वह मित्र के कर्तव्य को पूरा करता है तो वह रिश्तेदार है बन्धु है, मित्र है, सखा है।
    मिल जाता है जिस प्राणी को सत्य प्रेममय मित्र कहीं, निराधार भवसिंधु बीज वह कर्णधार को पाता है प्रेमभाव लेकर जो उसको सचमुच पार लगाता है। मित्र तो वहीं है जिस पर पिता की भाँति विश्वास किया जा सके, दूसरे तो साथी मात्र है। इसलिए मित्र के तीन लक्षण हैं- अहित से रोकना, हित में लगाना और विपत्ति में न छोड़ना।
        दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं;
        दोस्तों की मेहरबानी चाहिए’ (अदम)

  सच्चा मित्र वह है जो उस समय अन्दर आता है, जब सारा संसार बाहर हो चुका होता है।
    अतः प्राण देकर भलाई करें, द्रोह तथा छल का कभी नाम न लें, अपनी तरह प्रेम करें, यही मैत्री धर्म है।

लेखक रजत मुखर्जी