राष्ट्रीय

विकास का नारा और हकीकत

राजनीती में लिए गए फैसले हमेशा आमजन को प्रभावित करते रहे हैं। ऐसे में किसी फैसले पर आमजन जबरदस्त समर्थन भी करते हैं तो कहीं विरोध भी दर्ज कराते हैं। ऐसे ही देवघर, झारखण्ड के सचिन्द्र नाथ झा भी हैं जो सरकार के फैसलों पर अपनी राय रख रहे हैं:-

लेखक सचिन्द्र नाथ झा

वर्तमान केंद्र सरकार की सिर्फ एक ही उपलब्धि है। उसने आम जनता के ऊपर टैक्स का बोझ लाद दिया है जैसे लग रहा है की जनता की चमड़ी छील रहे हैं। देश का घरेलू बचत पांच दशक के निचले स्तर से भी नीचे पहुँच चुका है। बाकी सिर्फ नारे बनाओ और उसका जोरशोर से प्रचार करो।
    प्रचार के बल पर गोरा बनाने का क्रीम इसी देश में बिकती है। उसी तर्ज पर सरकार भी नए नए नारे बनाकर प्रचार करती है। जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है देश की। कुछ बड़े नारे का एक दो का उदाहरण-

सबका साथ सबका विकास:- सबका साथ सबका विकास पर हकीकत में साथ कुछ का और विकास भी उन्हीं कुछ कुछ का हो रहा है।
    स्वच्छ भारत अभियान:-  इसके प्रचार के लिए बड़े बड़े नेता, दिग्गज नेता हाथों में झाड़ू लेकर साफ जगह को ही साफ कर रहे थे जबकि पिछले 11 सालों में देश में अस्वच्छता हर तरफ बढ़ गई है। चाहे वह शहर की हो यह व्यक्ति और नेताओं के वाणी की हर तरफ अस्वच्छता ही दिखती है। सभी अपने जगह पर स्वयंभू बने हुए है चाहे गंदगी हो या नेताओं की वाणी और उनका व्यवहार।
    नमामि गंगे:- ये नारा गंगा की सफाई के लिए बनाए गए प्रोजेक्ट का था। पर ज़मीनी हकीकत आज किसी से छिपी नहीं है कि गंगा कितनी साफ हुई है, कितनी स्वच्छ हुई है और कितनी निर्मल हुई है। ये सभी जानते हैं। नमामि गंगे प्रोजेक्ट हजारों करोड़ रुपये का था पर इन हजारों करोड़ रुपये का फायदा माँ गंगा को नहीं मिल पाया फायदा कोई और उठा गया और अपनी जेब में भर के चलता बना। बेचारी आज भी गंगा अपने आप को साफ करने में जुटी हुई है।
  मेक इन इंडिया:- एक बहुत बड़ा नारा निर्माण क्षेत्र के लिए बनाया गया जिसका नाम है मेक इन इंडिया ये नारा या टैग लाइन सीधा विदेशी निवेश यानी एफडीआइ को आकर्षित करने के लिए बनाया गया था इसके पीछे बड़े बड़े दावे किए गए मेक इन इंडिया के बदौलत भारत चीन को पछाड़ के दुनिया का सबसे बड़ा निर्माणकर्ता देश बनेगा। पर हुआ क्या ? वही ढाक के तीन पात निर्माण क्षेत्र में बहुत कम जिसे कहा जा सकता है नगण्य विदेशी निवेश आया। चीन से जीतने भी निर्माता निकले वे वियतनाम कंबोडिया आदि छोटे छोटे देशों में चले गए। हाँ मेक इन इंडिया की बदौलत  चीन के सामानो का असेंबली हब जरूर बन गया है। चीन से टुकड़ों में सामान मंगवाते हैं और उसे जोड़कर अपना बना लेते हैं  ठप्पा लगा देते है मेक इन इंडिया। भारत के निर्माता अब दलाल निर्माता बन चूके हैं ये लोग खोज और विकास यानी आरएनडी पर कुछ खर्च नहीं करते सिर्फ कॉपी पेस्ट करते हैं।सिर्फ सरकार से मिलकर सरकारी संसाधनों को अधिग्रहित करते हैं और अपना फायदा उठाते हैं। सरकार भी मुट्ठीभर लोगों को सरकारी संसाधन खुले हाथ से बांट रही है। इस बंदरबाट में आम जनता को तो कुछ नहीं मिलता हाँ मुट्ठीभर पूंजीपतियों की अर्थव्यवस्था गजब की चमक रही है। देश के पूंजीपतियों के नाम फोर्ब्स के लिस्ट में आ रहे हैं। कुछ पूँजीपति तो दुनिया में उच्च स्थान रखते हैं।
  अब जब इनकी अर्थव्यवस्था बढ़ रही है तो ज़ाहिर है सरकारी संसाधनों की बदौलत बढ़ रही है जिससे देश की अर्थव्यवस्था भी बढ़ रही है। इसी बढ़त की बदौलत देश की अर्थव्यवस्था आज दुनिया के चौथे पर पहुँचने  वाली  है। जबकि हकीकत ये है की आज भी देश कि सरकार 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त अनाज दे रही है। 80,00,00,000 यानी देश की आबादी का करीब करीब 56%।
   दूसरी तरफ प्रचार किया जा रहा है की गरीबी कम हुई है असल में देश के मुट्ठी भर लोग सरकार के साथ मिलकर सरकारी संसाधनों को लूट रहे हैं इसका एक उदाहरण देश में विगत सालों में सड़क इन्फ्रा और बिल्डिंग इन्फ्रा में तरक्की हुई है। पर इसका फायदा आम जनता को मिला ?
  सड़क इन्फ्रा को ही ले लें देश आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सड़क जाल वाला देश है। इसमें भी सड़क से ज्यादा यह जाल ही दिखता है जिसमे आम जनता को फंसाकर लूटा जा रहा है जैसे टोल टैक्स का जाल, आधे अधूरे प्लानिंग के साथ सड़क का जाल बिछाया गया है। सड़कों को धार्मिक जुलूसों के लिए बंद कर दिया जाता है। हम एक तरफ दुनिया के सड़क जाल में दूसरे नंबर पे है वही दुनिया के सबसे खतरनाक सड़कों वाला देश भी है।
     एक सर्वे के अनुसार देश में हर 3 मिनट में सड़क हादसे में एक व्यक्ति की मृत्यु होती है। सड़क गुणवत्ता में हम दुनिया के देशों में 52 वें नंबर पर हैं।
   दूसरा उदाहरण देश में तेल की कीमतों का है। कच्चे तेल का आयात मूल्य पहले से बहुत कम हुआ है पर पेट्रोल डीजल की कीमतें पहले से लगभग दोगुनी हो गई है। 2008 में कच्चे तेल का आयात मूल्य 39.1 रुपये प्रति लीटर था और पेट्रोल की कीमत ₹50.62 तथा डीजल की कीमत ₹34.80 था । 2025 में कच्चे तेल का आयात मूल्य ₹34.63 प्रति लीटर है वहीं डीजल का दाम ₹90.76 और पेट्रोल का दाम 95 से ₹105 प्रति लीटर है सरकार टैक्स बढ़ाकर कमा रही है तेल कंपनियों भी कम आ रही है। रूस से सस्ते तेल का आयात होता है और उसे शोधित करके  ऊंचे  दामों पर विदेश निर्यात कर दिया जाता है।इसमें भारी मुनाफा तेल कंपनियां विशेषकर निजी तेल कंपनियां बना रही है।
देश की अर्थव्यवस्था दुनियां में चौथे नंबर पर रहेगी जबकि प्रतिव्यक्ति आय दुनियां में 141 वें नंबर पर है। इससे पता चलता है कि आय का वितरण किस तरह हो रहा है। मुठ्ठी भर लोगों की आय बहुत तेजी से बढ़ रही है।

One thought on “विकास का नारा और हकीकत

  • Abhishek Biswas

    बहुत अच्छा और सटीक लिखा है। विश्वगुरु ने सबको भिखारी बना दिया है।

Comments are closed.