देवघर (शहर परिक्रमा)

चौबीस साल बाद मिला इंसाफ, दो साल जेल में भी काटे

देवघर जिला के तत्कालीन करों थाना (वर्तमान पाथरौल थाना ) के अंतर्गत बधनाडीह गांव के लगभग 90 वर्षीय बूढ़े मो.एनूल होला उसके दो पुत्र मो. उस्मान मियां एवं मो. इस्राफिल मियां तथा जमीला खातून को अंततः झारखंड उच्च न्यायालय की माननीय रंजन मुखोपाध्याय एवं माननीय प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने विगत दिनांक 7 फरवरी 2001 को हुई कथित हत्या के आरोप में चारों को देवघर जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश 3 द्वारा सत्र वाद संख्या 339/2001  में पारित निर्णय दिनांक 10 जनवरी 2003 के द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को गलत करार देते हुए सभी को निर्दोष बताते हुए उनकी अपराधिक अपील स्वीकार कर लिया है।

    इस बारे में जानकारी देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता देवघर कोर्ट अशोक कुमार राय ने बताया कि ये मामला मृतक मो. रफीक अंसारी जो कोलियरी से सेवानिवृत्त कर्मी थे उनकी नतिनी फातिमा खातून की शिकायत पर कि अभियुक्तों ने नाली को लेके हुए
    झगड़े में भुजाली, लोहे के सब्बल, टांगी इत्यादि से मृतक की हत्या, रेडियो, साइकिल 7000 रूपये की चोरी इत्यादि का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी।

वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक कुमार राय

   जिसके आधार पर करौं थाना कांड संख्या 12 वर्ष 2001को धारा 341, 323, 448, 379, 504, 302, 120 भी,, 34 भा.द.वि. में दर्ज कर अनुसंधान के बाद आरोप पत्र दाखिल किया।
    जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश 3 देवघर की अदालत ने 448, 302/34, 379/34, 376/511/34 भा.द.वि. में चारों अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप गठन कर गवाहों के परीक्षण के बाद चारों को हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा दी थी जिस निर्णय के विरुद्ध अपराधिक अपील(डी.बी.) संख्या -:- 283 वर्ष 2003 दायर किया जिसमें तुरंत 2003 में ही झारखंड उच्च न्यायालय ने चारों को जमानत दे दी थी !
   अभी उच्च न्यायालय में अधिवक्ता अशोक राय, अनिल कुमार झा आस्तिक ने अभियुक्तों की ओर से अपीलीय बहस में भाग लिया जबकि सरकार की ओर से मनोज कुमार मिश्र APP ने बहस किया। सनद रहे चारों अभियुक्तों ने स्वयं ही न्यायालय में मुकदमा दर्ज होने के तुरंत  बाद एक सप्ताह के अंदर न्यायालय में आत्म समर्पण किया और लगातार दो साल जेल में रहने के बाद इसी अपील में 2003 में जेल से बाहर निकले तब तक अशोक कुमार राय अधिवक्ता ने बिना फीस ग्यारह गवाहों का जिरह किया एवं अंतिम बहस भी किया था। जिस कड़ी मेहनत का फल इस अपील में अभियुक्तों सह अपीलकर्ता गण कमिला 22 साल बाद ही सही लेकिन अब तो मिला न्याय।