देवघर (शहर परिक्रमा)

पंडित प्रदीप मिश्रा ‘सीहोर वाले’ द्वारा तृतीय दिवस के अमृत वचनों का सार

देवघर: आज आयोजित भागवत/शिव महापुराण कथा के तीसरे दिवस में परम पूज्य पंडित प्रदीप मिश्रा ‘सीहोर वाले’ महाराज जी ने जीवन, भक्ति और व्यवहार से जुड़े अनेक गूढ़ संदेशों को अत्यंत सरल और प्रेरक रूप में उपस्थित किया।

उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि—
👉जीवन की हर विपत्ति हमें प्रश्नता (आनंद, प्रसन्नता) की सीख देकर जाती है।
👉शिव का स्मरण समय का मोहताज नहीं—जब चाहो करो, क्योंकि शिव इस हृदय में सदैव शांति रूप से विराजते हैं।
👉ना गंगा बड़ी, ना गोदावरी—सबसे बड़ा तीर्थ तो मन का वह भाव है जहाँ शिव का वास होता है।
👉भोजन करते समय मन पवित्र रखें और चेहरे पर प्रसन्नता बनाए रखें।
👉भजन, कथा-श्रवण और मंदिर-दर्शन—इन सभी में पूर्ण भाव और एकाग्रता आवश्यक है; मन को उसी भाव से जोड़ना ही सच्ची भक्ति है।
आगे कहा कि आज मनुष्य कितना भी ब्रांडेड वस्त्र पहन ले, पर फोटो की सुंदरता चेहरे की प्रसन्नता से आती है। इसीलिए कैमरामैन भी अंतिम क्षण में कहता है—“स्माइल प्लीज़।”
उन्होंने जीवन-व्यवहार पर जोर देते हुए कहा—
👉कार्यालय, नौकरी या व्यापार कहीं भी रहें चिड़चिड़ापन नहीं, चेहरे पर प्रसन्नता रखें।
👉किसी से मिलें—यदि कुछ न दे सकें, तो कम से कम एक प्रसन्न चेहरा अवश्य दें।
पंडित प्रदीप मिश्रा ने माता सती की पवित्र भावना का उल्लेख करते हुए कहा—
माता सती ने अपने पिता से अपने पति शिवजी के सम्मान और आदर के अतिरिक्त कभी कुछ नहीं माँगा।
प्रकृति और अध्यात्म के संबंध पर उन्होंने कहा—
जिस प्रकार कपास के वस्त्र में भी बीज का तत्व समाया होता है, उसी प्रकार महापुराण को श्रवण करने वाले के भीतर भी शिव का तत्व प्रकट होता है।
अपने उद्बोधन के अंत में उन्होंने सभी भक्तों को संदेश दिया कि-
प्रसन्नता ही भक्ति का सबसे सुंदर आभूषण है, इसे जीवन के प्रत्येक क्षण में धारण करें।