चतुर्दश पूर्वांचल ज्योतिष सम्मेलन का आयोजन
देवघर: आज दिनांक 13.12.25 को चतुर्दश पूर्वांचल ज्योतिष सम्मेलन क़े द्वितीय सत्र में भारत के कई राज्यों से पधारे ज्योतिर्विदों ने अपना व्याख्यान दिया। जिसमें ज्योतिष शास्त्र के आलोक में पेड़ पौधे तथा नवरत्न एवं उपरत्न के विषय में अपना-अपना विचार प्रस्तुत किया।

आज क़े सत्र में कई विद्वानों ने अपना अनुभव रखते हुए सरकार से आग्रह किया कि बेलपत्र, पीपल, तुलसी, चंदन आदि पौधों को लगाकर भारत खुशहाल हो सकता है।

रांची की रजिस्टर्ड संस्था पूर्वांचल ज्योतिष संस्थान पब्लिक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा आयोजित कार्यक्रम क़े आयोजकों ने बताया कि कल प्रथम बेला में ज्योतिष शास्त्र के विविध आयामों पर चर्चा पर चर्चा होगी। द्वितीय सत्र में ज्योतिर्लिंग को सम्मान पत्र प्रदान किया जाएगा। इस मौके पर झारखण्ड सरकार क़े मंत्री संजय कुमार यादव एवं सुदिव्य कुमार सोनू ने भी आश्वासन दिया है कि वह इस सम्मेलन में पधार कर ज्योतिष शास्त्र की गरिमा तथा सम्मेलन के आयोजन को सफल बनाने के लिए सहयोग करेंगे।
इस कार्यक्रम में बनारस से आशीष आचार्य, दिल्ली से वरुण शर्मा, छत्तीसगढ़ से शिवरीनारायण मुंदड़ा, हरियाणा से राजेंद्र मुंजल, बिहार से मुरारी पांडे, आचार्य सत्येंद्र, बंगाल से केसी शर्मा, झारखंड से मनदीप शास्त्री, डॉ. डी महतो, पंडित रवि रंजन प्रभु, दिल्ली से कोमल पांडे, राजस्थान से डॉ पवन शर्मा, उड़ीसा से प्रो. रूद्र प्रसन्न महापात्र, कोलकाता से ओमप्रकाश तिवारी सहित कई अन्य पहुंचे हैं।


“ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा गया है, क्योंकि ज्योतिष के माध्यम से ही वेदों को देखा और समझा जाता है। मेरा यह मानना है कि ज्योतिष केवल भविष्य कथन नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला को विकसित करने का माध्यम है। स्वयं को जानने की कला ज्योतिष है और दूसरे को जानने की कला व्यापार है। आइए, इसे ज्योतिष के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।
कालपुरुष की कुंडली में सूर्य मेष राशि में उच्च का होकर लग्न भाव में स्थित है, जबकि शनि तुला राशि में उच्च का होकर सप्तम भाव में स्थित है। सप्तम भाव व्यापार का भाव माना जाता है और तुला राशि को बाजार की राशि भी कहा गया है।
स्वयं को जानने में मात्र एक महीना ही लगता है, क्योंकि सूर्य एक राशि में केवल एक ही महीना रहता है। जबकि दूसरे को जानने में लगभग 30 महीने लगते हैं, क्योंकि शनि एक राशि में लगभग 30 महीने तक रहता है। इस अवधि में शनि वक्री और मार्गी दोनों अवस्थाओं से गुजरता है, इसलिए किसी भी व्यक्ति पर विश्वास करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए—उसे वक्री और मार्गी होने दो, फिर उस पर विश्वास करो; ऐसा वेदों में कहा गया है।
लेकिन सूर्य कभी भी वक्री नहीं होता। कितना रहस्यमय और गूढ़ है ज्योतिष।”
Astro mohan balajii
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“ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा गया है, क्योंकि ज्योतिष के माध्यम से ही वेदों को देखा और समझा जाता है। मेरा यह मानना है कि ज्योतिष केवल भविष्य कथन नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला को विकसित करने का माध्यम है। स्वयं को जानने की कला ज्योतिष है और दूसरे को जानने की कला व्यापार है। आइए, इसे ज्योतिष के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।
कालपुरुष की कुंडली में सूर्य मेष राशि में उच्च का होकर लग्न भाव में स्थित है, जबकि शनि तुला राशि में उच्च का होकर सप्तम भाव में स्थित है। सप्तम भाव व्यापार का भाव माना जाता है और तुला राशि को बाजार की राशि भी कहा गया है।
स्वयं को जानने में मात्र एक महीना ही लगता है, क्योंकि सूर्य एक राशि में केवल एक ही महीना रहता है। जबकि दूसरे को जानने में लगभग 30 महीने लगते हैं, क्योंकि शनि एक राशि में लगभग 30 महीने तक रहता है। इस अवधि में शनि वक्री और मार्गी दोनों अवस्थाओं से गुजरता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति पर विश्वास करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए—उसे वक्री और मार्गी होने दो, फिर उस पर विश्वास करो; ऐसा वेदों में कहा गया है।
लेकिन सूर्य कभी भी वक्री नहीं होता। कितना रहस्यमय और गूढ़ है ज्योतिष।”