अंतर्राष्ट्रीय

वर्तमान परिदृश्य और संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता

द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद दुनिया के देशों ने एक संस्था बनाई—संयुक्त राष्ट्र संघ। इसका उद्देश्य था दुनिया में शांति और सौहार्द कायम करना, उपनिवेशवाद को खत्म करना और राष्ट्रों की संप्रभुता पर बाहरी हस्तक्षेप को रोकना। यह संस्था इस विश्वास के साथ बनाई गई थी कि अब दुनिया ताकत के बल पर नहीं, बल्कि नियम और नैतिकता के आधार पर चलेगी।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार इसके चार मुख्य लक्ष्य तय किए गए—अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा, राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मानवाधिकारों की रक्षा। लेकिन व्यवहार में यह संस्था अपने सबसे बुनियादी उद्देश्य युद्ध रोकने और संप्रभुता बचाने में लगातार विफल होती चली गई।

     जल्द ही यह स्पष्ट होने लगा कि संयुक्त राष्ट्र को ताकतवर देशों ने अपने हितों के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सुरक्षा परिषद का भेदभावपूर्ण गठन है। विश्व के ताकतवर देशों ने अपने हाथों में संपूर्ण शक्ति समेट ली। इस संस्था के माध्यम से प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रों, कमजोर देशों और चुनौती देने वालों को सबक सिखाने की प्रक्रिया शुरू हो गई।
संयुक्त राष्ट्र ने अपने गठन के तुरंत बाद ही फिलिस्तीन को दो टुकड़ों में बाँट दिया। एक नया देश बनाया गया—इज़राइल। यह किसी शांतिपूर्ण सहमति का परिणाम नहीं था, बल्कि किसी के भूभाग पर जबरन कब्जा कर नई राजनीतिक व्यवस्था थोपने का तरीका था। आज तक फिलिस्तीन और इज़राइल का कोई समाधान नहीं निकल पाया। फिलिस्तीन में पैदा हुए असंतोष को हिंसा कहकर खारिज किया गया और जो लोग अपना भूभाग वापस पाना चाहते थे, उन्हें आतंकवादी घोषित कर दिया गया। असल समस्या ‘संप्रभुता’ हाशिये पर चली गई।
चीन ने एक शांतिप्रिय बौद्ध देश तिब्बत पर सैन्य शक्ति से कब्जा कर लिया। संयुक्त राष्ट्र वहाँ भी कुछ नहीं कर सका।
    अफगानिस्तान में पहले सोवियत यूनियन ने अप्रत्यक्ष रूप से कब्जा जमाया। इसके जवाब में अमेरिका ने एक निजी सेना तैयार करवाई। इसका काम था सोवियत समर्थित सरकार को हटाना। इसमें अमेरिका को आंशिक सफलता मिली। जो संगठन उस समय उपयोगी थे, वही आगे चलकर आतंकवादी घोषित कर दिए गए। एक धड़ा सत्ता में आया, दूसरा बाहर रहा, और पूरा देश स्थायी युद्धभूमि बन गया। यहाँ भी संयुक्त राष्ट्र केवल दर्शक बना रहा।
     फिर मामला आया इराक का। जबरदस्ती सैन्य कार्रवाई की गई और वहाँ के राष्ट्रपति को फांसी दे दी गई। हमले का समर्थन संयुक्त राष्ट्र से यह कहकर लिया गया कि इराक के पास व्यापक विनाश के हथियार हैं। बाद में यह दावा झूठा साबित हुआ। तब तक इराक तबाह बर्बाद हो चुका था। अमेरिका उसके कच्चे तेल पर कब्जा कर चुका था। लेकिन सैन्य कार्रवाई के बाद वहाँ भी असंतोष उभरा, जिसे आतंकवाद का नाम दे दिया गया। एक संप्रभु राष्ट्र पूरी तरह अस्थिर कर दिया गया।
सोवियत यूनियन का विघटन हुआ। इसके पीछे अमेरिका का हाथ बताया जाता है। सोवियत यूनियन अमेरिका से भी ज्यादा ताकतवर बन चुका था और उसके छद्म उपनिवेशवाद को चुनौती दे रहा था। इसे शीत युद्ध काल कहा गया। उस दौर में दोनों देश सीधे नहीं टकराते थे, लेकिन संतुलन बना रहता था। इस संतुलन के टूटने के बाद संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता और कमजोर होती चली गई।
     इक्कीसवीं सदी में ईरान पर प्रतिबंध लगाकर उसे अलग-थलग किया गया। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है। रूस अपनी सैन्य शक्ति से लड़ रहा है, जबकि यूक्रेन को अमेरिका और यूरोपीय देशों का समर्थन मिल रहा है। यह युद्ध अभी भी चल रहा है।
     चीन अफ्रीकी और एशियाई देशों में अप्रत्यक्ष रूप से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। अमेरिका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरीकों से हस्तक्षेप कर रहा है।
     नए साल 2026 में अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर प्रत्यक्ष हमला किया गया और वहाँ के राष्ट्रपति को उठा लिया गया। वहाँ आंतरिक राजनीतिक विरोध भी था, आरोप थे कि चुनाव में धांधली हुई। लेकिन यह सब उस देश का आंतरिक मामला था। इस आधार पर किसी संप्रभु राष्ट्र पर हमला करना सरासर दादागिरी है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी के घर में आपसी झगड़ा चल रहा हो और बाहरी ताकतें आकर फैसला सुना दें।
   अब स्थिति यह है कि किसी भी देश को संयुक्त राष्ट्र चार्टर की चिंता नहीं रह गई है। ताकतवर देश अपनी मनमानी से हस्तक्षेप कर रहे हैं और दिखाया यह जा रहा है कि संप्रभुता कायम है। असल में यह छद्म उपनिवेशवाद है।
   इन सभी कब्जों के पीछे दो कारण साफ दिखाई देते हैं—हथियारों की बिक्री और संसाधनों पर कब्जा। इज़राइल का गठन अरब देशों पर प्रभुत्व के लिए किया गया। तिब्बत, इराक, यूक्रेन और वेनेजुएला—सभी मामलों में संसाधन और रणनीतिक हित निर्णायक रहे।
इस तरह देखा जाए तो संयुक्त राष्ट्र संघ अपने उद्देश्य में पूर्ण रूप से विफल रहा है। वह युद्ध रोक नहीं पाया और राष्ट्रों की संप्रभुता की रक्षा भी नहीं कर पाया। सोवियत यूनियन के विघटन के बाद यह संस्था और कमजोर हो गई। अमेरिका एकछत्र महाशक्ति बन गया। जहाँ सैन्य कार्रवाई संभव है, वहाँ करता है; जहाँ नहीं, वहाँ प्रतिबंध और टैरिफ का खेल खेलता है।
   महात्मा गांधी ने कहा था कि हिंसा से पैदा हुई व्यवस्था कभी स्थायी नहीं होती। आज की वैश्विक राजनीति उसी हिंसा को संस्थागत रूप दे चुकी है। तृतीय विश्व युद्ध शायद किसी एक दिन शुरू नहीं होगा, बल्कि छोटे-छोटे युद्धों, कब्जों और हस्तक्षेपों में फैलता चला जाएगा।
और इस पूरी प्रक्रिया में संयुक्त राष्ट्र संघ मूक दर्शक बना हुआ है। ऐसा लगता है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ का फातिहा ही पढ़ दिया गया है। यह बिल्कुल मरणासन्न हो चुका है युद्ध, शांति और संप्रभुता के उद्देश्य के संदर्भ में।

लेखक शचिन्द्र नाथ झा