देवघर (शहर परिक्रमा)

‘वन्देमातरम गीत के 150 साल’ पर संगोष्ठी का आयोजन

देवघर: स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान तथा योगमाया मानवोत्थान ट्रस्ट के युग्म बैनर तले वंदे मातरम गीत के 150 साल, वर्षीय कार्यक्रम के अंतर्गत दीनबंधु उच्च विद्यालय में एक संगोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें लगभग 100 शिक्षाविदों की भागीदारी हुई।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित देवघर पुस्तक मेला के स्मारिका प्रभारी सुमन कुमार वाजपेयी ने कहा- भारत की राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक “वंदे मातरम्” वर्ष 2027 में अपने 150 वर्ष पूरे कर रहा है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1872 में रचित यह गीत केवल देशभक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीयों की एकता, साहस और बलिदान की पहचान है। स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान यह गीत क्रांतिकारियों की ताकत बना और आज भी हमारी सांस्कृतिक जड़ों, राष्ट्रीय गर्व और मातृभूमि के प्रति सम्मान का स्रोत है।        

समाजसेवी रीता चौरसिया ने कहा-“वंदे मातरम्” में हमारी धरती को माता माना गया है, जो हमें फल-फूल, नदियाँ, पर्वत और जीवन देती है। इसलिए हम इसे मां की तरह सम्मान देते हैं। आज भी स्कूलों में, कार्यक्रमों में और राष्ट्रीय पर्वों पर यह गीत गर्व से गाया जाता है। 150 वर्षों में “वंदे मातरम्” केवल एक गीत नहीं रहा, बल्कि यह हमारी संस्कृति, इतिहास और भारतीयता की पहचान बन चुका है। हमें इस गीत के महत्व को समझना चाहिए और देश के प्रति सम्मान रखना चाहिए।
     वेक्सो इंडिया के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा-“वंदे मातरम्” के 150 वर्ष हमें यह याद दिलाते हैं कि हमारी मातृभूमि सबसे कीमती है। इस गीत से हमें देशप्रेम, एकता और सम्मान की सीख मिलती है।
       प्रगतिशील लेखक संघ, देवघर के अध्यक्ष प्रो. रामनन्दन सिंह ने कहा- “वंदे मातरम्” को भारत के सबसे महत्वपूर्ण देशभक्ति गीतों में से एक है, जो आज अपने 150 गौरवशाली वर्ष पूरे कर रहा है। इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1872 में ‘आनंदमठ’ उपन्यास के लिए लिखा था। बाद में यह गीत स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा बन गया। अधिवक्ता गणेशप्रसाद उमर ने कहा- जब भारत अंग्रेजों से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था, तब “वंदे मातरम्” ने युवाओं, नेताओं और क्रांतिकारियों को एकजुट करने का काम किया। यह गीत सुनते ही लोगों में जोश भर जाता था और वे आज़ादी के लिए संघर्ष करने को तैयार हो जाते थे। दीनबंधु उच्च विद्यालय के प्रधानाध्यापक काजल कांति सिकदार ने कहा- वन्देमातरम गीत में भारत माता की सुंदरता का उल्लेख है, हरी-भरी धरती, बहती नदियाँ, लहलहाते खेत और नीला आकाश। यह दर्शाता है कि हमारा देश केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि हमारी माँ है। विजया सिंह बबली ने कहा-वंदे मातरम्” के 150 वर्ष इस बात का प्रमाण हैं कि देशप्रेम की भावना कभी पुरानी नहीं होती। यह गीत हमें इतिहास से जोड़ता है और बेहतर राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। आज जब “वंदे मातरम्” के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं, हमें इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को समझना चाहिए। यह गीत हमें हर परिस्थिति में देश के प्रति निष्ठावान रहने की प्रेरणा देता है। स्कूलों, सरकारी कार्यक्रमों, राष्ट्रीय त्योहारों और कई सांस्कृतिक आयोजनों में इसे सम्मानपूर्वक गाया जाता है। “वंदे मातरम्” देश की एकता, विविधता और गौरव को दर्शाता है। 150 साल बाद भी इसकी धुन और संदेश नए भारत के युवाओं को प्रेरित करते हैं। रामेश्वर लाल सर्राफ उच्च विद्यालय के वरीय शिक्षक डॉ. विजय शंकर ने कहा इस गीत में भारत माता को देवी के रूप में दर्शाया गया है, जो अपने बच्चों को अन्न, जल, आश्रय और समृद्धि प्रदान करती है। गीत की पंक्तियाँ हमें यह समझाती हैं कि मातृभूमि की सेवा करना हमारा सर्वोच्च कर्तव्य है। देवघर सेंट्रल स्कूल के प्राचार्य सुबोध कुमार झा ने कहा-1905 के स्वदेशी आंदोलन से लेकर 1947 तक, “वंदे मातरम्” भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की धड़कन बना रहा।