राष्ट्रीय

देशनायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग 79 वर्ष उपरांत भी जनमानस पर एक ऐसे राष्ट्र-नायक यदि किसी भारत के अनन्य सेवक का नाम लिया जाता है तो सुभाष चन्द्र बोस का नाम अनायास ही होठों पर आ जाता है। यद्यपि न तो उन्हें स्वतंत्र भारत में प्रकट होने का अवसर मिला और न ही वर्षों का गौरव ही उन्होंने प्राप्त किया। एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे सुभाष चन्द्र बोस भारतीय मानस पटल पर नेताजी के नाम से विख्यात रहे।

   सन 1920 में आई.सी.एस. की परीक्षा में उनका उच्च स्थान था। परंतु, जिस व्यक्ति के मन में राष्ट्र के प्रति प्रेम की भावना उमड़ रही थी तथा दासता की श्रृंखलाओं से जकड़ी भारत माँ को स्वतंत्र कराने की दृढ़ आकांक्षा हो, वहाँ वह व्यक्ति कभी गुलामी के बंधनों में बंधकर अपना जीवन व्यतीत करना स्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए नेताजी ने ब्रिटिश सिविल सेवा से त्याग-पत्र दे दिया। देशभक्त चित्तरंजन दास और गांधी जी की प्रेरणा से उन्होंने 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार की।
     जिस प्रकार से नेताजी ने सबसे सशक्त रूप से संघर्ष किया, वह भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। वे अनेक बार कारावास भुगतने पड़े, परंतु उनके हृदय में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अडिग लक्ष्य ने उस संघर्ष से विमुख नहीं होने दिया। वे निरंतर संघर्ष में जुटे रहे। उनका कहना था—
“तुम मुझे खून दो—मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”
   सन 1924 में कोलकाता कॉर्पोरेशन के मुख्य अधिकारी के रूप में उनकी प्रतिभा की विशेष छाप प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में अंकित हो चुकी थी। सुभाष चन्द्र बोस नरम विचारधारा के विरुद्ध थे। पूर्ण स्वराज्य ही उनका चरम लक्ष्य था। इसलिए उन्होंने सन 1928 में कोलकाता में हुए कांग्रेस की विषय समिति की बैठक में नरमपंथी प्रस्ताव का जोरदार विरोध किया।
     उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि सन 1939 में महात्मा गांधी के विरोध के बावजूद भारी समर्थन से कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में अध्यक्ष निर्वाचित हो गए थे। अपने अध्यक्षीय भाषण में नेताजी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि ब्रिटिश सरकार से स्वतंत्रता प्राप्ति की माँग के लिए निश्चित समय निर्धारित किया जाना चाहिए और यदि विदेशी सरकार इस माँग की पूर्ति नहीं करती है, तो सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह आंदोलन आरंभ किया जाना चाहिए। नेताजी एक ऐसे व्यक्ति थे जिनमें जनमानस का भरपूर समर्थन प्राप्त था।
     द्वितीय विश्वयुद्ध के समय नेताजी चाहते थे कि अवसर की प्रतीक्षा न कर अंतरराष्ट्रीय स्थिति का पूरा-पूरा लाभ उठाया जाए तथा इंग्लैंड से शत्रुता रखने वाले सभी देशों से सहायता प्राप्त की जाए। परिणाम स्पष्ट ही था। ब्रिटिश सरकार के लिए नेताजी एक खतरनाक भूमिका निभाने वाले क्रांतिकारी व्यक्ति समझे गए, जिससे उन्हें घर में ही नजरबंद कर दिया गया।
     लेकिन आजादी के मतवाले, द्वाराने के पथिक नेताजी कब पीछे हटने वाले थे। सुभाष चन्द्र 26 जनवरी 1941 को चुपके-चुपके घर से भाग खड़े हुए। पहले काबुल पहुँचे, फिर वहीं से जर्मनी पहुँच गए। सन 1943 में वे जर्मनी से सिंगापुर जा पहुँचे और वहाँ समस्त भारतीय सैनिकों को संगठित किया, जो अंग्रेजों द्वारा मलाया प्रायद्वीप में क़ैद किए गए थे। उन सैनिकों को संगठित कर एक झंडे के नीचे कर नाम दिया—“आजाद हिन्द फ़ौज”।
   उनके बढ़ते कदम कहाँ रुकने वाले थे? उन्होंने 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिन्द सरकार गठित की तथा भारत को स्वतंत्र कराने हेतु पूर्व की ओर से ब्रिटिश-भारतीय क्षेत्र पर आक्रमण किया। वे रंगून स्थित कोहिमा तक पहुँच गए। इसी अंतराल में जापान की पराजय सुभाष चन्द्र के लिए गहरा आघात था। परिणामस्वरूप नेताजी को सिंगापुर से एक विमान द्वारा जापान के लिए प्रस्थान करना पड़ा।
     कहा जाता है कि वह विमान 18 अगस्त 1945 को दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें नेताजी की अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। इतिहास साक्षी है—जो भी हुआ, भारतीय जनमानस को आज भी विश्वास नहीं हो पाता है कि सुभाष चन्द्र बोस नहीं रहे। सत्य है कि अब वे जीवित नहीं हैं, परंतु छोटे-बड़े, युवा-वृद्ध, शिक्षित-अशिक्षित सभी के मन में उनकी स्मृति आज भी सजीव है, श्रद्धायुक्त है।

लेखक रजत मुखर्जी